Transliteration: (Man kaana yureedul 'izzata falillaahil 'izzatu jamee'aa; ilaihi yas'adul kalimut taiyibu wal'amalus saalihu yarfa'uh; wallazeena yamkuroonas sayyiaati lahum 'azaabun shadeed; wa makru ulaaa'ika huwa yaboor)
"जो कोई इज़्ज़त चाहता हो, तो सारी इज़्ज़त अल्लाह ही के लिए है [30]; उसी की तरफ़ पाकीज़ा कलिमात चढ़ते हैं [31] और नेक अमल उन्हें बुलंद करता है; और जो लोग बुरी साज़िशें करते हैं [32] उनके लिए सख़्त अज़ाब है; और उनकी साज़िश ख़ुद ही बर्बाद हो जाएगी [33]!"
इज़्ज़त की तलबगार को अल्लाह की चौखट पर सर झुकाना चाहिए। अल्लाह तआला अपने नबियों और मोमिनीन को अपनी अता से इज़्ज़त बख़्शता है: "इज़्ज़त अल्लाह, उसके रसूल और ईमान वालों के लिए है" (सूरह मुनाफ़िक़ून)।
कलिमा-ए-तौहीद, ज़िक्र व तस्बीह और पाकीज़ा कलाम अल्लाह की बारगाह में पेश होते हैं और नेक अमल उन कलिमात को बारगाहे इलाही में क़बूलियत का शर्फ़ दिलाते हैं।
दारुन्नदवा में मुशरिक़ीने मक्का ने हुज़ूर ﷺ के ख़िलाफ़ जो साज़िशें रची थीं, वे सब दुनिया में ख़ाक में मिल गईं और आख़िरत में उनके लिए दर्दनाक अज़ाब तय है।
काफ़िरों की मक्कारी और फ़रेब अपने शबाब पर पहुँचकर तबाह व बर्बाद हो जाएंगे, जबकि इस्लाम और नूरे मुहम्मदी ﷺ हमेशा ग़ालिब रहेगा।
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