Transliteration: (Afaman zuyyina lahoo sooo'u 'amalihee fara aahu hasanaa; fa innal laaha yudillu mai yashaaa'u wa yahdee mai yashaaa'u falaa tazhab nafsuka 'alaihim hasaraat; innal laaha 'aleemun bimaa yasna'oon)
"भला क्या वह शख़्स जिसके लिए उसका बुरा अमल ख़ुशनुमा बना दिया गया हो पस वह उसे अच्छा समझता हो [24]? पस बेशक अल्लाह जिसे चाहता है गुमराह छोड़ देता है और जिसे चाहता है हिदायत अता फ़रमाता है; पस आपकी जान उन पर हसरतों में न घुले [25]; बेशक अल्लाह ख़ूब जानता है जो कुछ वे करते हैं।"
यह आयत अबू जहल और मुशरिक़ीने मक्का के हक़ में नाज़िल हुई जो गुनाह व शिर्क करते थे और उस पर फ़ख़्र जताते थे। अपनी बुराई को हुस्न समझना नफ़्स का सबसे बड़ा फ़रेब है, जिससे तौबा का दरवाज़ा बंद हो जाता है।
हुज़ूर अकरम ﷺ को फ़रमाया गया कि इन बद-बख़्तों के ईमान न लाने पर अपना दिल रंजीदा न फ़रमाएं। उनका कुफ़्र इस्लाम या आपकी मुबारक ज़ात को कोई नुक़सान नहीं पहुँचा सकता।
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