कुरान - 35:22 सूरह फातिर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

22
وَمَا يَسۡتَوِي ٱلۡأَحۡيَآءُ وَلَا ٱلۡأَمۡوَٰتُۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُسۡمِعُ مَن يَشَآءُۖ وَمَآ أَنتَ بِمُسۡمِعٖ مَّن فِي ٱلۡقُبُورِ

Transliteration: (Wa mā yastawī al-aḥyāʾu wa lā al-amwāt; inna Allāha yusmiʿu man yashāʾu wa mā anta bimusmiʿin man fī alqubūr)

और न ज़िंदे और मुर्दे बराबर हो सकते हैं [67]; बेशक अल्लाह जिसे चाहता है सुना देता है [68], और आप उन्हें नहीं सुना सकते जो क़ब्रों में हैं [69]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फातिर आयत 22 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ातिर तफ़सीर - आयत 22

"और न ज़िंदे और मुर्दे बराबर हो सकते हैं [67]; बेशक अल्लाह जिसे चाहता है सुना देता है [68], और आप उन्हें नहीं सुना सकते जो क़ब्रों में हैं [69]।"

[67] मोमिन रूहानी तौर पर ज़िंदा और काफ़िर मुर्दा हैं

यहाँ 'ज़िंदे' से मुराद साहेबाने ईमान हैं जिनके दिल मारिफ़त व हिदायत से धड़कते हैं, और 'मुर्दे' से मुराद काफ़िर हैं जिनके दिल कुफ़्र की वजह से रूहानी तौर पर मुर्दा हो चुके हैं।

[68] अल्लाह जिसे चाहे समाअत अता फ़रमाता है

अल्लाह तआला जिसे चाहता है ग़ैर-मामूली सुनने की ताक़त अता फ़रमाता है; जैसे हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने मीलों दूर से चींटी की आवाज़ सुन ली। और जिसे चाहे, कान के पर्दे सलामत होने के बावजूद हक़ की आवाज़ से बहरा कर देता है।

[69] 'क़ब्रों वाले' से मुराद काफ़िर हैं — मुर्दे सुनते हैं

यहाँ 'क़ब्रों में पड़े मुर्दों' से मुराद वे काफ़िर हैं जिनके सीने कुफ़्र की क़ब्र बन चुके हैं, यानी वे हिदायत की बात क़बूल करने के लिए तैयार नहीं।
अहले सुन्नत वल जमाअत का मुत्तफ़िक़ा अक़ीदा है कि क़ब्रों में मदफ़ून इंसान ब-इज़ने इलाही सुनते हैं (समाए मौता हक़ है):

  • क़ब्रिस्तान जाकर 'अस्सलामु अलैकुम या अहलल क़ुबूर' कहना सुन्नत है, और सलाम ज़िंदा व सुनने वाले ही को किया जाता है।
  • नमाज़ में तशह्हुद के अंदर 'अस्सलामु अलैका अय्युहन्नबिय्यु' पढ़ना वाजिब है, क्योंकि प्यारे मुस्तफ़ा ﷺ अपनी क़ब्रे अनवर में हयात हैं और उम्मत का सलाम सुनते हैं।
  • जंगे बद्र के कुफ़्फ़ार के लाशे जब कुएं में डाले गए तो हुज़ूर ﷺ ने उन्हें पुकारा; सहाबा के पूछने पर फ़रमाया: "तुम उनसे ज़्यादा सुनने वाले नहीं हो!" (बुख़ारी शरीफ़)।

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