Transliteration: (Wa mā yastawī al-aḥyāʾu wa lā al-amwāt; inna Allāha yusmiʿu man yashāʾu wa mā anta bimusmiʿin man fī alqubūr)
"और न ज़िंदे और मुर्दे बराबर हो सकते हैं [67]; बेशक अल्लाह जिसे चाहता है सुना देता है [68], और आप उन्हें नहीं सुना सकते जो क़ब्रों में हैं [69]।"
यहाँ 'ज़िंदे' से मुराद साहेबाने ईमान हैं जिनके दिल मारिफ़त व हिदायत से धड़कते हैं, और 'मुर्दे' से मुराद काफ़िर हैं जिनके दिल कुफ़्र की वजह से रूहानी तौर पर मुर्दा हो चुके हैं।
अल्लाह तआला जिसे चाहता है ग़ैर-मामूली सुनने की ताक़त अता फ़रमाता है; जैसे हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने मीलों दूर से चींटी की आवाज़ सुन ली। और जिसे चाहे, कान के पर्दे सलामत होने के बावजूद हक़ की आवाज़ से बहरा कर देता है।
यहाँ 'क़ब्रों में पड़े मुर्दों' से मुराद वे काफ़िर हैं जिनके सीने कुफ़्र की क़ब्र बन चुके हैं, यानी वे हिदायत की बात क़बूल करने के लिए तैयार नहीं।
अहले सुन्नत वल जमाअत का मुत्तफ़िक़ा अक़ीदा है कि क़ब्रों में मदफ़ून इंसान ब-इज़ने इलाही सुनते हैं (समाए मौता हक़ है):
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