Transliteration: (Wa mina al-nāsi wa al-dawābbi wa al-anʿāmi mukhtalifun alwānuhū kadhālik; innamā yakhshā Allāha min ʿibādihī al-ʿulamāʾ; inna Allāha ʿAzīzun Ghafūr)
"और इसी तरह इंसानों, जानवरों और चौपायों में भी मुख़्तलिफ़ रंग हैं [80]; अल्लाह के बंदों में से [81] उससे सिर्फ़ वही डरते हैं जो इल्म रखने वाले हैं [82]; बेशक अल्लाह ज़बरदस्त, बहुत बख़्शने वाला है।"
इंसानों, परिंदों, दरिंदों और चौपायों में अनगिनत रंग और सूरतें अल्लाह की क़ुदरत का इज़हार हैं। जिस तरह ज़ाहिरी रंग मुख़्तलिफ़ हैं, उसी तरह दिलों के अहवाल भी जुदा हैं। क़यामत के दिन बातिन का रंग चेहरों पर ज़ाहिर होगा — साहेबाने ईमान के चेहरे नूरानी और काफ़िरों के चेहरे सियाह होंगे।
'इबाद' से मुराद या तो कुल मख़्लूक़ात है या बिल-ख़ुसूस इंसान, जो अल्लाह के अहकाम के मुकल्लफ़ हैं।
यह आयत उलमा-ए-दीन की अज़ीम शान व फ़ज़ीलत की दलील है। अल्लाह की अज़मत, जलाल और सिफ़ात का जितना गहरा इल्म किसी को होगा, उसके दिल में अल्लाह का ख़ौफ़ और तक्वा उतना ही ज़्यादा होगा। यहाँ 'उलमा' से मुराद वे उलमा-ए-हक़ और साहेबाने बातिन हैं जो सहीह अक़ीदा रखते हैं और अपने इल्म पर अमल करते हैं।
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