कुरान - 35:29 सूरह फातिर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

29
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَتۡلُونَ كِتَٰبَ ٱللَّهِ وَأَقَامُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَأَنفَقُواْ مِمَّا رَزَقۡنَٰهُمۡ سِرّٗا وَعَلَانِيَةٗ يَرۡجُونَ تِجَٰرَةٗ لَّن تَبُورَ

Transliteration: (Innal lazeena yatloona Kitabbal laahi wa aqaamus Salaata wa anfaqoo mimmaa razaqnaahum sirranw wa ‘alaa niyatany yarjoona tijaaratal lan taboor)

बेशक जो लोग अल्लाह की किताब की तिलावत करते हैं [83] और नमाज़ क़ायम करते हैं [84] और जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से ख़र्च करते हैं [85], पोशीदा और ज़ाहिरा [86], वे ऐसी तिजारत के उम्मीदवार हैं जिसमें कभी नुक़सान नहीं [87]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फातिर आयत 29 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ातिर तफ़सीर - आयत 29

"बेशक जो लोग अल्लाह की किताब की तिलावत करते हैं [83] और नमाज़ क़ायम करते हैं [84] और जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से ख़र्च करते हैं [85], पोशीदा और ज़ाहिरा [86], वे ऐसी तिजारत के उम्मीदवार हैं जिसमें कभी नुक़सान नहीं [87];"

[83] तिलावते क़ुरआन की अज़ीम इबादत और फ़ज़ीलत

क़ुरआने पाक की तिलावत करना अज़ीम तरीन इबादत है, इसीलिए इसका ज़िक्र नमाज़ से भी पहले फ़रमाया गया। समझ कर पढ़ना तो नूरुन अला नूर है, लेकिन सिर्फ़ लफ़्ज़ों की तिलावत करना भी सबब-ए-अज्र व सवाब और बरकत है। बच्चों को क़ुरआन पढ़ाना भी बाइस-ए-सवाब है (रूहुल मआनी)।

[84] पाबंदी और हुज़ूरी के साथ तिलावत व नमाज़

वे हर रोज़ क़ुरआने मजीद का विर्द रखते हैं और नमाज़ की पाबंदी करते हैं।

[85] राहे ख़ुदा में इनफ़ाक़ और अहल व अयाल का हक़

ख़र्च करने में ज़कात, सदक़ात, हज और दीनी ख़िदमात सब शामिल हैं। 'मिम्मा रज़क़नाहुम' (जो हमने दिया उसमें से) का लफ़्ज़ यह सिखाता है कि सारा माल ख़र्च नहीं करना चाहिए, बल्कि अपने बाल-बच्चों के लिए भी किफायत रखनी सुन्नत है।

[86] एलानिया और पोशीदा सदक़े की हिकमत

फ़र्ज़ ज़कात और आम चंदा एलानिया देना बेहतर है ताकि दूसरों को तरग़ीब हो, और नफ़्ली सदक़ा पोशीदा देना अफ़ज़ल है ताकि रियाकारी से बचा जा सके। इसी तरह जुमा व ईदैन बा-जमाअत और तहज्जुद तन्हाई में पढ़ी जाती है।

[87] ख़सारे से पाक ला-ज़वाल तिजारत और तवाज़ुअ

यहाँ दो नुक्ते हैं:

  1. इबादत सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा के लिए होनी चाहिए, रियाकारी और शोहरत के लिए नहीं।
  2. बंदे को कभी अपने आमाल पर नाज़ और घमंड नहीं करना चाहिए, बल्कि 'उम्मीदवार' (यरजूना) बनकर अल्लाह के करम की उम्मीद और रद्द हो जाने का ख़ौफ़ रखना चाहिए।

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