Transliteration: (Wa alladhī awḥaynā ilayka mina al-Kitābi huwa al-ḥaqqu muṣaddiqan limā bayna yadayh; inna Allāha biʿibādihī lakhabīrun Baṣīr)
"और जो किताब हमने आपकी तरफ़ वह्य फ़रमाई है [89] वही सच्चा हक़ है जो अपने से पहली किताबों की तस्दीक़ करती है [90]; बेशक अल्लाह अपने बंदों से पूरी तरह बा-ख़बर, ख़ूब देखने वाला है।"
'मिनल किताब' में 'मिन' बयान के लिए है, तबईज़ (टुकड़े) के लिए नहीं। इस आयत से यह भी साफ़ मालूम हुआ कि हुज़ूर अकरम ﷺ का इल्म सिर्फ़ क़ुरआने करीम के ज़ाहिर तक महदूद नहीं है; बल्कि आपके तमाम मुबारक फ़रमान और अहादीस भी अल्लाह ही की तरफ़ से वह्ये ग़ैर मतलू (इल्हामे इलाही) हैं, जैसा कि फ़रमाया गया: "और वे अपनी ख़्वाहिश से कलाम नहीं फ़रमाते, वह तो बस वह्य है जो भेजी जाती है" (सूरह नज्म)।
क़ुरआने मजीद तमाम पिछली किताबों की तस्दीक़ फ़रमाता है, लेकिन क़ुरआन के बाद किसी नई किताब या किसी नए नबी के आने की कोई बशारत नहीं दी गई। पिछली किताबें अपने बाद आने वाली किताबों की ख़बर देती थीं, मगर क़ुरआन आख़िरी किताब है, जो इस बात की क़तई दलील है कि हुज़ूर मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ ख़ातमुन नबिय्यीन (आख़िरी नबी) हैं।
इस आयत में मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद क़ादियानी और उसके पैरोकारों के झूठे दावों का खुला रद्द है। हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया: "मेरे बाद तीस बड़े कज़्ज़ाब (झूठे) पैदा होंगे, जिनमें से हर एक नबी होने का दावा करेगा, हालाँकि मैं ख़ातमुन नबिय्यीन हूँ, मेरे बाद कोई नबी नहीं!"
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