कुरान - 35:32 सूरह फातिर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

32
ثُمَّ أَوۡرَثۡنَا ٱلۡكِتَٰبَ ٱلَّذِينَ ٱصۡطَفَيۡنَا مِنۡ عِبَادِنَاۖ فَمِنۡهُمۡ ظَالِمٞ لِّنَفۡسِهِۦ وَمِنۡهُم مُّقۡتَصِدٞ وَمِنۡهُمۡ سَابِقُۢ بِٱلۡخَيۡرَٰتِ بِإِذۡنِ ٱللَّهِۚ ذَٰلِكَ هُوَ ٱلۡفَضۡلُ ٱلۡكَبِيرُ

Transliteration: (Summa awrasnal Kitaaballazeenas tafainaa min ‘ibaadinaa faminhum zaalimul linafsihee wa minhum muqtasidu, wa minhum saabiqum bilkhairaati bi iznil laah; zaalika huwal fadlul kabeer)

फिर हमने अपने चुने हुए बंदों को [91] इस किताब का वारिस बनाया [92]; पस उनमें से कोई तो अपनी जान पर ज़्यादती करने वाला है, और उनमें से कोई दरमियानी राह वाला (मियाना-रौ) है, और उनमें से कोई अल्लाह के हुक्म से नेकियों में आगे बढ़ जाने वाला है [93]; यही बहुत बड़ा फ़ज़्ल है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फातिर आयत 32 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ातिर तफ़सीर - आयत 32

"फिर हमने अपने चुने हुए बंदों को [91] इस किताब का वारिस बनाया [92]; पस उनमें से कोई तो अपनी जान पर ज़्यादती करने वाला है, और उनमें से कोई दरमियानी राह वाला है, और उनमें से कोई अल्लाह के हुक्म से नेकियों में आगे बढ़ जाने वाला है [93]; यही बहुत बड़ा फ़ज़्ल है।"

[91] क़ुरआन के वारिस — उम्मते मुहम्मदिया के मुंतख़ब उलमा व औलिया

अल्लाह तआला ने हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की उम्मत में से उलमा, हुफ़्फ़ाज़ और औलिया-ए-किराम को मुंतख़ब फ़रमाया जो क़ुरआने मजीद के मुफ़स्सिर, हाफ़िज़ और मुहाफ़िज़ हैं। यह इस उम्मत का अज़ीम शर्फ़ है कि उलमा-ए-इस्लाम अंबिया के वारिस और क़ुरआने हकीम के अमीन हैं।

[92] उम्मते मुहम्मदिया की अफ़ज़लियत और तीन गिरोह

यह आयत बताती है कि हुज़ूर ﷺ की उम्मत तमाम पिछली उम्मतों से अफ़ज़ल है। नबी-ए-पाक ﷺ ने फ़रमाया: "तुम में से बेहतरीन वह है जो क़ुरआन सीखे और दूसरों को सिखाए।" इस आयत में अहले ईमान के तीन तबक़ात बयान फ़रमाए गए हैं:

  1. ज़ालिमुल-लि-नफ़्सिह (अपनी जान पर ज़्यादती करने वाले): वे कमज़ोर मोमिन जिनसे गुनाह सरज़द हो जाते हैं, मगर ईमान सलामत है।
  2. मुक़्तसिद (मियाना-रौ): वे जो फ़राइज़ व वाजिबात अदा करते हैं और गुनाहे कबीरा से बचते हैं।
  3. साहिक़ुम बिल-ख़ैरात (नेकियों में आगे बढ़ने वाले): वे मुक़र्रबीन व औलिया जो अल्लाह के हुक्म से हर नेकी और तक़वे में सबक़त ले जाते हैं।
हदीस शरीफ़ में हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया: "नेकियों में आगे बढ़ने वाले बग़ैर हिसाब के जन्नत में जाएंगे; मियाना-रौ का हिसाब आसान होगा; और अपनी जान पर ज़ुल्म करने वाले थोड़ी मशक़्क़त के बाद बिलआख़िर जन्नत में दाख़िल कर दिए जाएंगे।" सूफ़िया फ़रमाते हैं कि यह इस उम्मत पर अल्लाह का सबसे अज़ीम फ़ज़्ल है।

[93] नेकियों में सबक़त ले जाने वाले और उनकी जन्नत

नेकियों में आगे बढ़ना अपनी ज़ाती ताक़त से नहीं बल्कि अल्लाह के फ़ज़्ल और तौफ़ीक़ से होता है। अल्लाह के मुक़र्रब बंदे हर लम्हा रज़ा-ए-इलाही की जुस्तजू में रहते हैं।

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