Transliteration: (Summa awrasnal Kitaaballazeenas tafainaa min ‘ibaadinaa faminhum zaalimul linafsihee wa minhum muqtasidu, wa minhum saabiqum bilkhairaati bi iznil laah; zaalika huwal fadlul kabeer)
"फिर हमने अपने चुने हुए बंदों को [91] इस किताब का वारिस बनाया [92]; पस उनमें से कोई तो अपनी जान पर ज़्यादती करने वाला है, और उनमें से कोई दरमियानी राह वाला है, और उनमें से कोई अल्लाह के हुक्म से नेकियों में आगे बढ़ जाने वाला है [93]; यही बहुत बड़ा फ़ज़्ल है।"
अल्लाह तआला ने हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की उम्मत में से उलमा, हुफ़्फ़ाज़ और औलिया-ए-किराम को मुंतख़ब फ़रमाया जो क़ुरआने मजीद के मुफ़स्सिर, हाफ़िज़ और मुहाफ़िज़ हैं। यह इस उम्मत का अज़ीम शर्फ़ है कि उलमा-ए-इस्लाम अंबिया के वारिस और क़ुरआने हकीम के अमीन हैं।
यह आयत बताती है कि हुज़ूर ﷺ की उम्मत तमाम पिछली उम्मतों से अफ़ज़ल है। नबी-ए-पाक ﷺ ने फ़रमाया: "तुम में से बेहतरीन वह है जो क़ुरआन सीखे और दूसरों को सिखाए।" इस आयत में अहले ईमान के तीन तबक़ात बयान फ़रमाए गए हैं:
नेकियों में आगे बढ़ना अपनी ज़ाती ताक़त से नहीं बल्कि अल्लाह के फ़ज़्ल और तौफ़ीक़ से होता है। अल्लाह के मुक़र्रब बंदे हर लम्हा रज़ा-ए-इलाही की जुस्तजू में रहते हैं।
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