कुरान - 41:34 सूरह फुस्सिलात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

34
وَلَا تَسۡتَوِي ٱلۡحَسَنَةُ وَلَا ٱلسَّيِّئَةُۚ ٱدۡفَعۡ بِٱلَّتِي هِيَ أَحۡسَنُ فَإِذَا ٱلَّذِي بَيۡنَكَ وَبَيۡنَهُۥ عَدَٰوَةٞ كَأَنَّهُۥ وَلِيٌّ حَمِيمٞ

Transliteration: (Wa laa tastawil hasanatu wa las saiyi'ah; idfa' billatee hiya ahsanu fa'izal lazee bainaka wa bainahoo 'adaawatun ka'annahoo waliyun hameem)

और नेकी और बदी बराबर नहीं हो सकतीं [91]; आप (बुराई का) ऐसे तरीक़े से जवाब दीजिए जो सबसे बेहतरीन हो [92], तो अचानक वह शख़्स कि आपके और उसके दरमियान दुश्मनी थी, ऐसा हो जाएगा जैसे वह जिगरी दोस्त हो [93]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फुस्सिलात आयत 34 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ुस्सिलत (हा-मीम अस-सजदा) तफ़सीर - आयत 34

और नेकी और बदी बराबर नहीं हो सकतीं [91]; आप (बुराई का) ऐसे तरीक़े से जवाब दीजिए जो सबसे बेहतरीन हो [92], तो अचानक वह शख़्स कि आपके और उसके दरमियान दुश्मनी थी, ऐसा हो जाएगा जैसे वह जिगरी दोस्त हो [93]!

[91] नेकी और बदी का अज़ीम फ़र्क़

ईमान और कुफ़्र, इताअत और नाफ़रमानी, हिल्म और ग़ुस्सा, और अहसान और ज़ुल्म कभी बराबर नहीं हो सकते। नेकी का नतीजा इज़्ज़त व सवाब है और बदी का अंजाम रुसवाई व अज़ाब है।

[92] बुराई का जवाब भलाई और हुस्ने अख़लाक़ से देना

इस्लामी अख़लाक़ का यह आला तरीन उसूल है कि अगर कोई तुम्हारे साथ ज़्यादती करे तो तुम माफ़ कर दो, जो ग़ुस्सा दिलाए उसके साथ नर्मी बरतो, और जो बुराई करे उसका जवाब एहसान और भलाई से दो। यह हुस्ने सुलूक दुश्मनों के दिलों को मोम कर देता है।

[93] दुश्मनी का मुहब्बत में बदल जाना

यह आयत हज़रत अबू सुफ़ियान के हक़ में नाज़िल हुई जो इस्लाम के सख़्त तरीन दुश्मन थे, मगर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बेमिसाल अख़लाक़, अफ़्व व दरगुज़र और करम नवाज़ियों ने उनके दिल को जीत लिया और वे फ़तह-ए-मक्का के मौक़े पर मुसलमान होकर जांनिसार सहाबी बन गए।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now