Transliteration: (Wa law ja'alnaahu Qur-aanan A'jamiyyal laqaaloo law laa fussilat Aayaatuhoo 'a A'jamiyyunw wa 'Arabiyy; qul huwa lillazeena aamanoo hudanw wa shifaaa'unw wallazeena la yu'minoona feee aazaanihim waqrunw wa huwa 'alaihim 'amaa; ulaaa'ika yunaadawna mim maakaanim ba'eed (section 5))
और अगर हम इसे ग़ैर-अरबी (अजमी) क़à¥à¤°à¤†à¤¨ बनाते [117], तो वे ज़रूर कहते [118]: इसकी आयतें खोल कर कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ न बयान की गईं [119]? कà¥à¤¯à¤¾ (किताब) अजमी और (रसूल) अरबी [120]! आप फ़रमा दीजिà¤: यह ईमान वालों के लिठहिदायत और शिफ़ा है [121]; और जो लोग ईमान नहीं लाते, उनके कानों में बहरापन है [122] और यह उन पर अंधापन है [123]; ये वे लोग हैं जिनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ दूर की जगह से पà¥à¤•ारा जा रहा हो [124]।
अगर क़à¥à¤°à¤†à¤¨ अरबी के सिवा किसी दूसरी ज़बान में नाज़िल होता, तो ये मà¥à¤¶à¤°à¤¿à¤•़ीन à¤à¤¤à¤°à¤¾à¤œà¤¼ करते कि हम तो अरबी हैं, हमारी समठमें यह अजमी कलाम कैसे आà¤! और ताजà¥à¤œà¥à¤¬ करते कि रसूल अरबी हैं और किताब अजमी है! अलà¥à¤²à¤¾à¤¹ तआला ने उनकी ही फ़सीह ज़बान में क़à¥à¤°à¤†à¤¨ नाज़िल फ़रमाया ताकि समà¤à¤¨à¥‡ में कोई रà¥à¤•ावट न रहे, मगर उनकी बदनीयती ने फिर à¤à¥€ हक़ को क़बूल न किया।
क़à¥à¤°à¤†à¤¨ करीम ईमान वालों के लिठदिलों की तमाम बीमारियों (शक, निफ़ाक़, तकबà¥à¤¬à¥à¤°) की शिफ़ा है और सीधे रासà¥à¤¤à¥‡ की मà¥à¤•मà¥à¤®à¤² हिदायत व रहनà¥à¤®à¤¾à¤ˆ है।
काफ़िरों के दिलों पर कà¥à¤«à¤¼à¥à¤° की à¤à¤¸à¥€ सियाही छाई है कि उनके कान हक़ सà¥à¤¨à¤¨à¥‡ से बहरे और उनकी आंखें हक़ देखने से अंधी हो चà¥à¤•ी हैं।
जैसे किसी शख़à¥à¤¸ को बहà¥à¤¤ दूर से पà¥à¤•ारा जाठतो उसे सिरà¥à¤«à¤¼ आवाज़ का शोर सà¥à¤¨à¤¾à¤ˆ देता है मगर बात पलà¥à¤²à¥‡ नहीं पड़ती, उसी तरह ये काफ़िर क़à¥à¤°à¤†à¤¨ के अलà¥à¤«à¤¼à¤¾à¤œà¤¼ सà¥à¤¨à¤¤à¥‡ हैं मगर उसके मानी व मक़सूद से बिलकà¥à¤² महरूम रहते हैं।
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