कुरान - 11:62 सूरह हूद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

62
قَالُواْ يَٰصَٰلِحُ قَدۡ كُنتَ فِينَا مَرۡجُوّٗا قَبۡلَ هَٰذَآۖ أَتَنۡهَىٰنَآ أَن نَّعۡبُدَ مَا يَعۡبُدُ ءَابَآؤُنَا وَإِنَّنَا لَفِي شَكّٖ مِّمَّا تَدۡعُونَآ إِلَيۡهِ مُرِيبٖ

Transliteration: (Qaaloo yaa Saalihu qad kunta feenaa marjuwwan qabla haazaaa atanhaanaaa an na'bu da maa ya'budu aabaaa'unaa wa innanaa lafee shakkim mimmaa tad'oonaaa ilaihi mureeb)

वे बोले, 'ऐ सालेह! इससे पहले तो तुम हम में उम्मीदों के मरकज़ थे [132]। क्या तुम हमें उन माबूदों की पूजा से रोकते हो जिनकी पूजा हमारे बाप-दादा करते आए हैं [133]? और जिस चीज़ की तुम हमें दावत दे रहे हो, उसके बारे में तो हम ऐसे शक में पड़े हैं जिसने हमें उलझन में डाल रखा है [134]।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह हूद आयत 62 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा हूद – आयत 62 की तफ़्सीर

✅ [132] ऐलान-ए-नुबुव्वत से पहले इज़्ज़त व वक़ार

क़ौम के लोग हज़रत सालेह (अलै.) की अमानत, शराफ़त और दानिशमंदी की वजह से उनसे बड़ी उम्मीदें रखते थे और उन्हें सरदार बनाने की सोचते थे।

✅ [133] बुतपरस्ती की अंधी पैरवी

काफ़िरों ने बाप-दादा की रस्मों को दलील बनाकर तौहीद का इनकार कर दिया।

✅ [134] शक और हठधर्मी

वे बोले कि हमें तुम्हारी दावत में शदीद शक है, जो असल में उनके दिलों का रोग और इनकार था।

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