Transliteration: (Afalam yaseeroo fil ardi fayanzuroo kaifa kaana 'aaqibatul lazeena min qablihim; dammaral laahu 'alaihim wa lilkaafireena amsaaluhaa)
"क्या उन्होंने ज़मीन में सैर नहीं की कि वे देखते कि उनसे पहले लोगों का अंजाम क्या हुआ [23]? अल्लाह ने उन्हें पूरी तरह तबाह कर दिया [24], और इन काफ़िरों के लिए भी वैसा ही अंजाम है [25]।"
कुरआन मजीद लोगों को ज़मीन पर सफ़र करके पिछली सरकश क़ौमों (जैसे आद, समूद, क़ौम-ए-लूत और फ़िरऔन) के खंडहरों को देखने और इब्रत हासिल करने की दावत देता है। अरब के व्यापारी अपने तिजारती काफ़िलों में यमन और शाम जाते हुए इन उजड़ी बस्तियों के पास से गुज़रते थे।
इससे यह मस्अला साबित होता है कि इब्रत व सबक़ हासिल करने की नियत से तारीखी मक़ामात का सफ़र करना जाइज़ व मुस्तहसन है। और जिस तरह बर्बाद क़ौमों के खंडहरों को देखकर अल्लाह का ख़ौफ़ पैदा होता है, उसी तरह अंबिया व औलिया के मज़ारत व मुक़द्दस मक़ामात की ज़ियारत करने से अल्लाह की रहमत और मोहब्बत में इज़ाफ़ा होता है।
अल्लाह का अज़ाब अधूरा नहीं था; उसने उन सरकशों की जानों, उनके बच्चों और उनकी धन-दौलत व महलों को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया। उनके अहंकार और ताक़त का कोई नामोनिशान बाक़ी न रहा।
आयत के आख़िर में मक्का के मुशरिकीन और हर ज़माने के मुनकिरों को चेतावनी दी गई कि वे अल्लाह की पकड़ से सुरक्षित न समझें। यदि वे भी अपने कुफ़्र और रसूल ﷺ की मुख़ालिफ़त पर अड़े रहे, तो उनका अंजाम भी पिछली हलाकशुदा क़ौमों जैसा ही होगा।
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