कुरान - 47:38 सूरह मुहम्मद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

38
هَـٰٓأَنتُمۡ هَـٰٓؤُلَآءِ تُدۡعَوۡنَ لِتُنفِقُواْ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ فَمِنكُم مَّن يَبۡخَلُۖ وَمَن يَبۡخَلۡ فَإِنَّمَا يَبۡخَلُ عَن نَّفۡسِهِۦۚ وَٱللَّهُ ٱلۡغَنِيُّ وَأَنتُمُ ٱلۡفُقَرَآءُۚ وَإِن تَتَوَلَّوۡاْ يَسۡتَبۡدِلۡ قَوۡمًا غَيۡرَكُمۡ ثُمَّ لَا يَكُونُوٓاْ أَمۡثَٰلَكُم

Transliteration: (Haaa antum haaa'ulaaa'i tud'awna litunfiqoo fee sabeelillaahi faminkum many yabkhalu wa many yabkhal fa innamaa yabkhalu 'an nafsih; wallaahu Ghaniyyu wa antumul fuqaraaa'; wa in tatawallaw yastabdil qawman ghairakum summa laa yakoonooo amsaalakum (section 4))

हाँ! तुम वही लोग हो जिन्हें अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करने की दावत दी जाती है [92], तो तुम में से बाज़ बुख़्ल (कंजूसी) करते हैं [93]। और जो बुख़्ल करता है, वह अपनी ही जान से बुख़्ल करता है। और अल्लाह बेपरवाह (ग़नी) है, और तुम सब मोहताज हो [94]। और अगर तुम मुँह मोड़ोगे, तो वह तुम्हारी जगह दूसरी क़ौम ले आएगा, फिर वे तुम्हारे जैसे न होंगे [95]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह मुहम्मद आयत 38 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह मुहम्मद तफ़सीर - आयत 38

"हाँ! तुम वही लोग हो जिन्हें अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करने की दावत दी जाती है [92], तो तुम में से बाज़ बुख़्ल (कंजूसी) करते हैं [93]। और जो बुख़्ल करता है, वह अपनी ही जान से बुख़्ल करता है। और अल्लाह बेपरवाह (ग़नी) है, और तुम सब मोहताज हो [94]। और अगर तुम मुँह मोड़ोगे, तो वह तुम्हारी जगह दूसरी क़ौम ले आएगा, फिर वे तुम्हारे जैसे न होंगे [95]!"


[92] अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करने की दावत

जब भी इस्लाम की हिफ़ाज़त, जिहाद, ग़रीबों की इमदाद या दीनी ज़रूरतों के लिए माल की ज़रूरत हो, तो मोमिन को खुले दिल से अल्लाह की राह में ख़र्च करना चाहिए।


[93] बुख़्ल करने वाला अपना ही नुक़सान करता है

अगर कोई शख़्स माल रोक कर बैठता है, तो अल्लाह का कोई नुक़सान नहीं होता। वह कंजूस अपनी ही आक़िबत को बर्बाद करता है। दुनिया में भी उसके माल की बरकत ख़त्म हो जाती है और क़यामत के दिन वही माल ज़हरीले साँप की शक्ल में उसके गले का तौक़ बना दिया जाएगा।


[94] अल्लाह ग़नी है, सारी मख़लूक़ मोहताज है

अल्लाह तआला किसी का मोहताज नहीं, तमाम कायनात उसकी मोहताज है। अगरचे ग़रीब ज़ाहिर में अमीरों के मोहताज दिखते हैं, मगर हक़ीक़त में अमीर-ग़रीब सब के सब अल्लाह के फ़ज़ल के मोहताज हैं। और रूहानी तौर पर पूरी कायनात हुज़ूर अकरम ﷺ के वसीले और करम की मोहताज है। हुज़ूर ﷺ अल्लाह की नेमतों के बाँटने वाले (क़ासिम) हैं।


[95] क़ौम की तब्दीली और फ़ारसी/अंसार का संदर्भ

अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि अगर तुम इस्लाम की ख़िदमत से मुँह मोड़ोगे, तो अल्लाह तुम्हारी जगह ऐसी क़ौम ले आएगा जो जान व माल से दीन की ख़िदमत करेगी और तुम्हारी तरह सुस्ती नहीं करेगी।

जब सहाबा किराम ने पूछा: "या रसूलुल्लाह! वह कौन सी क़ौम होगी?" तो हुज़ूर अकरम ﷺ ने अपना दस्ते-मुबारक हज़रत सलमान फ़ारसी रज़ियल्लाहु अन्हु के कंधे पर रखकर फ़रमाया: "अगर ईमान सुरैय्या (सितारे) पर भी चला जाए, तो इनकी क़ौम (अहले-फ़ार्स/अजमी) के लोग उसे वहाँ से भी ढूँढ निकालेंगे।" इस्लाम किसी एक नस्ल या ख़ानदान का मोहताज नहीं; जो दीन की ख़िदमत करेगा, अल्लाह उसी को सरबुलंदी अता फ़रमाएगा।

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