कुरान - 47:34 सूरह मुहम्मद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

34
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ وَصَدُّواْ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ ثُمَّ مَاتُواْ وَهُمۡ كُفَّارٞ فَلَن يَغۡفِرَ ٱللَّهُ لَهُمۡ

Transliteration: (Innal lazeena kafaroo wa saddoo 'an sabeelil laahi summa maatoo wa hum kuffaarun falany yaghfirallaahu lahum)

बेशक जिन लोगों ने कुफ़्र किया और अल्लाह के रास्ते से रोका, फिर कुफ़्र की हालत में ही मर गए, अल्लाह उन्हें हरगिज़ नहीं बख़्शेगा [84]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह मुहम्मद आयत 34 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह मुहम्मद तफ़सीर - आयत 34

"बेशक जिन लोगों ने कुफ़्र किया और अल्लाह के रास्ते से रोका, फिर कुफ़्र की हालत में ही मर गए, अल्लाह उन्हें हरगिज़ नहीं बख़्शेगा [84]।"


[84] ख़ात्मा बिल-कुफ़्र (कुफ़्र पर मौत) की भयानक सज़ा

इस आयत में इस्लाम का अटल अक़ीदा बयान किया गया है:

  • अगर किसी शख़्स ने ज़िंदगी भर कुफ़्र किया हो, लेकिन मरने से पहले सच्चे दिल से तौबा करके इस्लाम क़बूल कर ले, तो अल्लाह उसके सारे पिछले गुनाह माफ़ फ़रमा देता है।
  • लेकिन अगर कोई शख़्स कुफ़्र की हालत में ही मर गया, तो उसके लिए मग़फ़िरत का दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद हो जाता है। अल्लाह तआला मुशरिकीन और काफ़िरों को कभी माफ़ नहीं फ़रमाएगा और उनका ठिकाना हमेशा-हमेशा की जहन्नम है।

दुआ है कि अल्लाह तआला हम सबको ईमान की सलामती और ख़ात्मा बिल-ख़ैर (ईमान पर मौत) अता फ़रमाए।

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