कुरान - 47:35 सूरह मुहम्मद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

35
فَلَا تَهِنُواْ وَتَدۡعُوٓاْ إِلَى ٱلسَّلۡمِ وَأَنتُمُ ٱلۡأَعۡلَوۡنَ وَٱللَّهُ مَعَكُمۡ وَلَن يَتِرَكُمۡ أَعۡمَٰلَكُمۡ

Transliteration: (Falaa tahinoo wa tad'ooo ilas salmi wa antumul a'lawna wallaahu ma'akum wa lany yatirakum a'maalakum)

तो तुम हिम्मत न हारो और सुलह की दावत न दो [85], जबकि तुम ही ग़ालिब रहोगे [86], और अल्लाह तुम्हारे साथ है, और वह तुम्हारे आमाल में हरगिज़ कोई कमी न करेगा [87]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह मुहम्मद आयत 35 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह मुहम्मद तफ़सीर - आयत 35

"तो तुम हिम्मत न हारो और सुलह की दावत न दो [85], जबकि तुम ही ग़ालिब रहोगे [86], और अल्लाह तुम्हारे साथ है, और वह तुम्हारे आमाल में हरगिज़ कोई कमी न करेगा [87]।"


[85] बुज़दिली और बेवक़्त सुलह की ममानअत

मोमिनों को ताकीद की गई कि मैदान-ए-जंग में कमज़ोरी या बुज़दिली न दिखाएँ और दुश्मन के सामने झुककर ख़ुद सुलह की भीख न माँगें, क्योंकि इससे इस्लाम की शान कमज़ोर होती है। अगर दुश्मन ख़ुद झुककर सुलह चाहे और उसमें मुसलमानों की भलाई हो, तो सुलह करना जाइज़ है (जैसा कि सूरह अल-अनफ़ाल, आयत 61 में है)।


[86] मोमिनों का हमेशा ग़ालिब रहना

अल्लाह ने वादा फ़रमाया कि अगर तुम्हारे अंदर सच्चा ईमान है, तो आख़िरकार ग़लबा तुम्हारा ही रहेगा ("व अंतुमुल अअ़लौना इन कुन्तुम मोमिनीन")। हक़ हमेशा बातिल पर भारी रहता है।


[87] दोनों हालतों में कामयाबी — फ़तह या शहादत

अल्लाह तआला की नुसरत ईमान वालों के साथ है। अपने कम साधनों या दुश्मन की बड़ी तादाद से मत घबराओ। अल्लाह तुम्हारे किसी अमल और क़ुरबानी को ज़ाया नहीं करेगा। मैदान में तुम्हें दो में से एक भलाई ज़रूर मिलेगी: या तो ग़ाज़ी बनकर फ़तह हासिल होगी, या शहीद होकर जन्नत नसीब होगी—दोनों सूरतों में मोमिन ही कामयाब है।

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