कुरान - 47:33 सूरह मुहम्मद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

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۞يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَطِيعُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُواْ ٱلرَّسُولَ وَلَا تُبۡطِلُوٓاْ أَعۡمَٰلَكُمۡ

Transliteration: (Yaaa ayyuhal lazeena aamanoo atee'ul laaha wa atee'ur Rasoola wa laa tubtilooo a'maalakum)

ऐ ईमान वालो! अल्लाह का हुक्म मानो और रसूल का हुक्म मानो, और अपने आमाल बर्बाद न करो [84]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह मुहम्मद आयत 33 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह मुहम्मद तफ़सीर - आयत 33

"ऐ ईमान वालो! अल्लाह का हुक्म मानो और रसूल का हुक्म मानो, और अपने आमाल बर्बाद न करो [84]।"


[84] इताअत-ए-रसूल ﷺ और आमाल की हिफ़ाज़त

इस मुबारक आयत में अल्लाह तआला ने दो अज़ीम बुनियादी उसूल बयान फ़रमाए हैं:

  1. इताअत-ए-इलाही और इताअत-ए-नबवी की लाज़िमी एकता: अल्लाह की इताअत रसूल की इताअत के बग़ैर मुमकिन नहीं। जो रसूल का फ़रमान मानता है वही हक़ीक़त में अल्लाह का फ़रमान मानता है।
  2. आमाल को ज़ाया होने से बचाना:
    • रियाकारी और दिखावे से बचना: दिखावे और शोहरत के लिए किया गया अमल बर्बाद हो जाता है।
    • गुनाह-ए-कबीरा और बेअदबी से बचना: नबी-ए-पाक ﷺ की शान में अदना सी गुस्ताख़ी भी ज़िंदगी भर की नेकियों को जलाकर राख कर देती है।
    • नफ़ल इबादत को बीच में न तोड़ना: फ़िक़्ह-ए-हनफ़ी का उसूल है कि जब कोई नफ़ल इबादत (जैसे नफ़ल नमाज़ या रोज़ा) शुरू कर दी जाए, तो उसे पूरा करना लाज़िम हो जाता है; बिला वजह बीच में तोड़ देने से वह अमल बर्बाद हो जाता है और उसकी क़ज़ा वाजिब होती है।

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