कुरान - 47:1 सूरह मुहम्मद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

1
ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ وَصَدُّواْ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ أَضَلَّ أَعۡمَٰلَهُمۡ

Transliteration: (Allazeena kafaroo wa saddoo'an sabeelil laahi adalla a'maalahum)

जिन लोगों ने कुफ़्र किया और अल्लाह के रास्ते से रोका [1], अल्लाह ने उनके आमाल बर्बाद कर दिए [2] [3]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह मुहम्मद आयत 1 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह मुहम्मद तफ़सीर - आयत 1

"जिन लोगों ने कुफ़्र किया और अल्लाह के रास्ते से रोका [1], अल्लाह ने उनके आमाल बर्बाद कर दिए [2] [3]।"


[1] मक्का के काफ़िरों का संदर्भ

यह आयत विशेष रूप से मक्का के मुशरिकीन और काफ़िरों के बारे में नाज़िल हुई, जिन्होंने न केवल स्वयं इस्लाम का इनकार किया, बल्कि दूसरों को भी अल्लाह के रास्ते (दीन-ए-इस्लाम) को स्वीकार करने से रोका।

लेकिन यह हुक्म कयामत तक आने वाले हर उस शख़्स पर लागू होता है जो कुफ़्र अपनाए और हक़ के प्रचार में बाधा डाले।


[2] आमाल की बरबादी और निष्फलता

यहाँ 'अदल्ला' का अर्थ है उनके आमाल को ज़ाया और अकारथ कर देना। इसका भावार्थ यह है कि:

  • काफ़िरों ने जो भी साज़िशें और चालें रसूलुल्लाह ﷺ और मुसलमानों के ख़िलाफ़ चली थीं, अल्लाह ने उन तमाम साज़िशों को नाकाम और बेअसर कर दिया।
  • वे इस्लाम की बढ़ती हुई रौशनी को बुझाना चाहते थे, मगर अल्लाह तआला ने अपने नूर को पूर्ण किया और उनकी सारी कोशिशों को ख़ाक में मिला दिया।

[3] ईमान के बिना नेकियों का कोई सवाब नहीं

यदि काफ़िर दुनिया में कोई अच्छा काम भी करते—जैसे भूखों को खाना खिलाना, ग़रीबों की मदद करना या रिश्तेदारों से भलाई करना—तो ईमान के बिना आख़िरत में उन आमाल का कोई मूल्य या सवाब नहीं मिलता।

ईमान नेकी के स्वीकार होने की बुनियादी शर्त है; बिना ईमान के किए गए तमाम दुनियावी भले काम आख़िरत के दिन धूल की तरह उड़ा दिए जाएँगे।

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