कुरान - 47:2 सूरह मुहम्मद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

2
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّـٰلِحَٰتِ وَءَامَنُواْ بِمَا نُزِّلَ عَلَىٰ مُحَمَّدٖ وَهُوَ ٱلۡحَقُّ مِن رَّبِّهِمۡ كَفَّرَ عَنۡهُمۡ سَيِّـَٔاتِهِمۡ وَأَصۡلَحَ بَالَهُمۡ

Transliteration: (Wallazeena aamanoo wa 'amilus saalihaati wa aamanoo bimaa nuzzila 'alaa Muhammadinw-wa huwal haqqu mir Rabbihim kaffara 'anhum saiyiaatihim wa aslaha baalahum)

और जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे काम किए, और उस चीज़ पर ईमान लाए जो मुहम्मद (ﷺ) पर नाज़िल की गई [4]—और वही उनके रब की तरफ़ से हक़ है—अल्लाह ने उनकी बुराइयों को उनसे दूर कर दिया [5] और उनकी हालत संवार दी [6]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह मुहम्मद आयत 2 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह मुहम्मद तफ़सीर - आयत 2

"और जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे काम किए, और उस चीज़ पर ईमान लाए जो मुहम्मद (ﷺ) पर नाज़िल की गई [4]—और वही उनके रब की तरफ़ से हक़ है—अल्लाह ने उनकी बुराइयों को उनसे दूर कर दिया [5] और उनकी हालत संवार दी [6]।"


[4] हुज़ूर अकरम ﷺ पर ईमान की अनिवार्यता और ख़ास ज़िक्र

आम तौर पर ईमान लाने का हुक्म पहले आ चुका था, लेकिन यहाँ ख़ास तौर पर "जो मुहम्मद (ﷺ) पर नाज़िल हुआ" का अलग से ज़िक्र फ़रमाया गया। इससे कई अहम अकीदे और हक़ीक़तें स्पष्ट होती हैं:

  1. कुरआन की विशिष्टता: कुरआन-ए-पाक अल्लाह की वह मुबारक किताब है जो तमाम पिछली किताबों की तस्दीक करने वाली और उनके अहकाम के लिए कसौटी है।
  2. आक़ा-ए-दो-आलम ﷺ की केंद्रीय हैसियत: यह साबित हुआ कि जब तक कोई व्यक्ति मुहम्मदुर रसूलुल्लाह ﷺ पर नाज़िल होने वाली शरीअत और आपकी रिसालत पर पूरी तरह ईमान न लाए, उसका ईमान कभी मुकम्मल और क़ाबिल-ए-क़बूल नहीं हो सकता।
  3. ख़त्मे नुबुव्वत: हुज़ूर ﷺ अल्लाह के आख़िरी नबी हैं और आपकी शरीअत क़यामत तक के लिए अटल सच्चाई है।

[5] इस्लाम लाने से पिछले गुनाहों की माफ़ी

अल्लाह तआला ने ईमान लाने वालों के पिछले तमाम गुनाहों को मिटा दिया। शरीअत का उसूल है कि जब कोई काफ़िर सच्चे दिल से इस्लाम कबूल करता है, तो उसके कुफ़्र के ज़माने के सारे गुनाह (अल्लाह के हुकूक से मुताल्लिक) पूरी तरह माफ़ कर दिए जाते हैं, जैसे वह आज ही माँ के पेट से पैदा हुआ हो।


[6] हालत का संवारना और हुकूक़ुल इबाद की अहमियत

अल्लाह ने ईमान वालों की ज़ाहिरी और बातिनी हालत को दुरुस्त कर दिया:

  • दिल का सुकून: उनके दिलों को कुफ़्र व शिर्क की बेचैनी से निकालकर ईमान और यक़ीन की शांति अता फ़रमाई।
  • नेकियों की हिफ़ाज़त: कुफ़्र की हालत में की गई नेकियों को ज़ाया नहीं किया, बल्कि इस्लाम लाने के बाद उन्हें भी बरक़रार रखा।
  • हुकूक़ुल इबाद (मानव अधिकार): यह बात याद रखनी चाहिए कि इस्लाम क़बूल करने से केवल हुकूक़ुल्लाह (अल्लाह के हुकूक़) के गुनाह माफ़ होते हैं; लोगों के हक़ (जैसे क़र्ज़, चोरी, ज़ुल्म) तब तक माफ़ नहीं होते जब तक हक़दारों को उनका हक़ न लौटाया जाए या वे माफ़ न कर दें। इस्लाम न्याय और रहमत दोनों का संगम है।

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