Transliteration: (Wallazeena aamanoo wa 'amilus saalihaati wa aamanoo bimaa nuzzila 'alaa Muhammadinw-wa huwal haqqu mir Rabbihim kaffara 'anhum saiyiaatihim wa aslaha baalahum)
"और जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे काम किए, और उस चीज़ पर ईमान लाए जो मुहम्मद (ﷺ) पर नाज़िल की गई [4]—और वही उनके रब की तरफ़ से हक़ है—अल्लाह ने उनकी बुराइयों को उनसे दूर कर दिया [5] और उनकी हालत संवार दी [6]।"
आम तौर पर ईमान लाने का हुक्म पहले आ चुका था, लेकिन यहाँ ख़ास तौर पर "जो मुहम्मद (ﷺ) पर नाज़िल हुआ" का अलग से ज़िक्र फ़रमाया गया। इससे कई अहम अकीदे और हक़ीक़तें स्पष्ट होती हैं:
अल्लाह तआला ने ईमान लाने वालों के पिछले तमाम गुनाहों को मिटा दिया। शरीअत का उसूल है कि जब कोई काफ़िर सच्चे दिल से इस्लाम कबूल करता है, तो उसके कुफ़्र के ज़माने के सारे गुनाह (अल्लाह के हुकूक से मुताल्लिक) पूरी तरह माफ़ कर दिए जाते हैं, जैसे वह आज ही माँ के पेट से पैदा हुआ हो।
अल्लाह ने ईमान वालों की ज़ाहिरी और बातिनी हालत को दुरुस्त कर दिया:
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