Transliteration: (Fa-izaa laqeetumul lazeena kafaroo fadarbar riqaabi, hattaaa izaa askhan tumoohum fashuddul wasaaqa, fa immaa mannnam ba'du wa immaa fidaaa'an hattaa tada'al harbu awzaarahaa; zaalika wa law yashaaa'ul laahu lantasara minhum wa laakin li yabluwa ba'dakum bi ba'd; wallazeena qutiloo fee sabeelil laahi falany yudilla a'maalahum)
"तो जब काफ़िरों से तुम्हारा सामना हो (मैदान-ए-जंग में), तो गर्दनों पर मारो [10], यहाँ तक कि जब तुम उन्हें अच्छी तरह कुचल दो (ज़ख़्मी कर दो), तो उन्हें मज़बूती से बाँध लो, फिर उसके बाद चाहे एहसान रखकर छोड़ दो या फ़िदया (मुआवज़ा) लेकर [11], जब तक कि जंग अपने हथियार (बोझ) न डाल दे [12]। हुक्म यही है। और अगर अल्लाह चाहता तो ख़ुद उनसे बदला ले लेता [13], लेकिन (उसने ऐसा इसलिए हुक्म दिया) ताकि वह तुम्हारा एक दूसरे के ज़रिए इम्तिहान ले [14]। और जो लोग अल्लाह के रास्ते में शहीद किए गए [15], अल्लाह उनके आमाल को हरगिज़ ज़ाया न फ़रमाएगा [16]।"
यह हुक्म आम ज़िंदगी के लिए नहीं, बल्कि जंग के मैदान (कारज़ार-ए-हक़ व बातिल) से संबंधित है। जंग में मुसलमानों को हुक्म दिया गया कि दुश्मन पर पूरी ताक़त से वार करें और उनकी फ़ौजी ताक़त व सरगनों को तोड़ दें। जब दुश्मन का ज़ोर टूट जाए और मुसलमानों का दबदबा क़ायम हो जाए, तब बचे हुए जंगजूओं को क़ैदी बनाया जाए। यह जंग के दौर का एक रणनीतिक और न्यायसंगत हुक्म है, न कि अंधाधुंध हिंसा की अनुमति।
इस आयत में शुरू में क़ैदियों को एहसान रखकर मुफ़्त छोड़ने या फ़िदया लेकर रिहा करने की अनुमति दी गई थी। लेकिन बाद में नाज़िल होने वाले अहकाम (जैसे सूरह अत-तौबा, आयत 5) ने मुफ़्त छोड़ने के कुछ हिस्सों को मंसूख़ (abrogate) कर दिया, और इस्लामी हुकूमत के अमीर को यह अधिकार दिया गया कि वह मसलेहत के मुताबिक़ फ़ैसला करे—चाहे क़त्ल करे, ग़ुलाम बनाए, फ़िदया ले या इस्लामी हित में रिहा करे। फ़तह-ए-मक्का के दिन नबी-ए-करीम ﷺ ने बाज़ मुजरिमों (जैसे इब्न ख़तल) से कोई फ़िदया नहीं लिया बल्कि सज़ा दी, जबकि आम मक्का वालों पर एहसान फ़रमाकर आम माफ़ी दी।
जंग का अंतिम मक़सद फ़साद फैलाना या ज़मीन हड़पना नहीं, बल्कि फ़ितना और ज़ुल्म का ख़ात्मा करना है। जब दुश्मन हथियार डाल दे, इस्लाम क़बूल कर ले या अमन का मुआहिदा कर ले, तो जंग का हुक्म ख़त्म हो जाता है। इस्लाम में जंग कभी भी अंतहीन या उद्देश्यहीन नहीं होती।
अल्लाह तआला क़ादिर-ए-मुतलक़ है; वह बिना किसी इंसानी कोशिश के दुश्मनों को एक पल में हलाक कर सकता था, जैसा कि उसने पिछली क़ौमों (क़ौम-ए-आद व समूद) के साथ किया। लेकिन उसने जिहाद का हुक्म इसलिए दिया ताकि बंदों के ईमान, इख़्लास और बहादुरी की आज़माइश हो और वे क़ुरबानी देकर अज़ीम दर्जे हासिल करें।
काफ़िरों के ख़िलाफ़ लड़ाई मोमिनों के लिए एक इम्तिहान है ताकि:
जो लोग अल्लाह के रास्ते में शहीद होते हैं, वे किसी ज़मीन, दौलत या क़ौमियत के लिए जान नहीं देते, बल्कि केवल अल्लाह के कलिमे को बुलंद करने और हक़ व इंसाफ़ की हिफ़ाज़त के लिए अपनी जान कुर्बान करते हैं। इसलिए उनकी शहादत मुक़द्दस है और उन्हें बारगाह-ए-इलाही में हमेशा की ज़िंदगी और अज़ीम अज्र हासिल होता है।
यह आयत ख़ास तौर पर ग़ज़वा-ए-उहुद के शहीदों के संदर्भ में नाज़िल हुई, जिसमें सत्तर से अधिक सहाबा किराम शहीद हुए थे। अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि उनके आमाल और उनकी क़ुर्बानियाँ कभी ज़ाया नहीं होंगी; अल्लाह उनके हर क़दम और हर क़तरे का भरपूर बदला अता फ़रमाएगा।
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