कुरान - 47:32 सूरह मुहम्मद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

32
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ وَصَدُّواْ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ وَشَآقُّواْ ٱلرَّسُولَ مِنۢ بَعۡدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمُ ٱلۡهُدَىٰ لَن يَضُرُّواْ ٱللَّهَ شَيۡـٔٗا وَسَيُحۡبِطُ أَعۡمَٰلَهُمۡ

Transliteration: (Innal lazeena kafaroo wa saddoo 'an sabeelil laahi wa shaaaqqur Rasoola min ba'di maa tabaiyana lahumul hudaa lany yadurrul laaha shai'anw wa sa yuhbitu a'maalahum)

बेशक जिन लोगों ने कुफ़्र किया और अल्लाह के रास्ते से रोका, और रसूल की मुख़ालिफ़त की [81] इसके बाद कि उन पर हिदायत बिल्कुल साफ़ हो चुकी थी [82], वे अल्लाह का कुछ नहीं बिगाड़ सकते, और वह जल्द ही उनके आमाल बर्बाद कर देगा [83]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह मुहम्मद आयत 32 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह मुहम्मद तफ़सीर - आयत 32

"बेशक जिन लोगों ने कुफ़्र किया और अल्लाह के रास्ते से रोका, और रसूल की मुख़ालिफ़त की [81] इसके बाद कि उन पर हिदायत बिल्कुल साफ़ हो चुकी थी [82], वे अल्लाह का कुछ नहीं बिगाड़ सकते, और वह जल्द ही उनके आमाल बर्बाद कर देगा [83]।"


[81] रसूल ﷺ की मुख़ालिफ़त का संगीन जुर्म

इस आयत में उन लोगों की सज़ा बयान की गई है जिन्होंने न केवल कुफ़्र किया बल्कि हुज़ूर अकरम ﷺ की दुश्मनी और मुख़ालिफ़त में आगे-आगे रहे। रसूल की मुख़ालिफ़त सीधे अल्लाह की मुख़ालिफ़त है।


[82] हक़ की पहचान के बावजूद इनकार

उनकी दुश्मनी किसी ग़लतफ़हमी की वजह से नहीं थी, बल्कि वे अच्छी तरह जानते थे कि हुज़ूर ﷺ अल्लाह के सच्चे रसूल हैं। इसके बावजूद अहंकार और हसद ने उन्हें हक़ का दुश्मन बना दिया।


[83] अल्लाह बेनियाज़ है और दुश्मनों के आमाल तबाह हैं

काफ़िरों की इन तमाम साज़िशों से अल्लाह के दीन या उसके रसूल का कोई नुक़सान नहीं हो सकता। अल्लाह अपने दीन को ग़ालिब करके रहेगा और उन मुनकिरों की सारी मेहनत आख़िरत में मिट्टी में मिल जाएगी।

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