कुरान - 47:30 सूरह मुहम्मद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

30
وَلَوۡ نَشَآءُ لَأَرَيۡنَٰكَهُمۡ فَلَعَرَفۡتَهُم بِسِيمَٰهُمۡۚ وَلَتَعۡرِفَنَّهُمۡ فِي لَحۡنِ ٱلۡقَوۡلِۚ وَٱللَّهُ يَعۡلَمُ أَعۡمَٰلَكُمۡ

Transliteration: (Wa law nashaaa'u la-arainaakahum fala 'araftahum bi seemaahum; wa lata'rifan nahum fee lahnil qawl; wallaahu ya'lamu a'maalakum)

और अगर हम चाहते तो आपको उन्हें दिखा देते ताकि आप उनके चेहरों से उन्हें पहचान लेते [73] [74]। और आप उनकी बात के अंदाज़ से ही उन्हें ज़रूर पहचान लेंगे [75]। और अल्लाह तुम्हारे सब आमाल को जानता है [76]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह मुहम्मद आयत 30 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह मुहम्मद तफ़सीर - आयत 30

"और अगर हम चाहते तो आपको उन्हें दिखा देते ताकि आप उनके चेहरों से उन्हें पहचान लेते [73] [74]। और आप उनकी बात के अंदाज़ से ही उन्हें ज़रूर पहचान लेंगे [75]। और अल्लाह तुम्हारे सब आमाल को जानता है [76]।"


[73] हुज़ूर ﷺ का ग़ैबी इल्म और मुनाफ़िक़ों की पहचान

अल्लाह तआला ने अपने महबूब ﷺ को ऐसा बसीरत-अफ़रोज़ इल्म अता फ़रमाया कि हुज़ूर ﷺ हर मुनाफ़िक़ के नाम और उसके दिल के निफ़ाक़ से पूरी तरह बाख़बर थे।


[74] चेहरों की पहचान (सीमाहुम)

चेहरे दिल का आईना होते हैं। जब मुनाफ़िक़ हुज़ूर ﷺ के सामने आते, तो उनके चेहरों की ज़र्दगी और ख़ौफ़ से उनकी अंदरूनी गन्दगी साफ़ झलक उठती थी।


[75] लहनुल क़ौल (बातचीत के अंदाज़ से पहचानना)

'लहनुल क़ौल' का अर्थ है बात करने का लहज़ा, लफ़्ज़ों का फेर-बदल और तंज़िया अंदाज़। जब मुनाफ़िक़ बात करते थे तो ज़ाहिर में तो ताज़ीम का नाटक करते, मगर उनके लहज़े में बुग़्ज़ और दो-अर्थी बात छुपी होती थी जिसे नबी ﷺ अपनी नबवी फ़रासत से तुरंत भाँप लेते थे।


[76] अल्लाह तमाम आमाल से बाख़बर है

कोई भी अमल, हरकत या गुप्त साज़िश अल्लाह की निगाह से ओझल नहीं हो सकती; वह हर एक को उसके आमाल का पूरा बदला देगा।

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