कुरान - 47:29 सूरह मुहम्मद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

29
أَمۡ حَسِبَ ٱلَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ أَن لَّن يُخۡرِجَ ٱللَّهُ أَضۡغَٰنَهُمۡ

Transliteration: (Am hasibal lazeena fee quloobihim maradun al lany yukhrijal laahu adghaanahum)

क्या वे लोग जिनके दिलों में (निफ़ाक़ की) बीमारी है, यह समझे बैठे हैं कि अल्लाह उनके दिलों के कीने (बैर) को ज़ाहिर नहीं फ़रमाएगा [72]? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह मुहम्मद आयत 29 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह मुहम्मद तफ़सीर - आयत 29

"क्या वे लोग जिनके दिलों में (निफ़ाक़ की) बीमारी है, यह समझे बैठे हैं कि अल्लाह उनके दिलों के कीने (बैर) को ज़ाहिर नहीं फ़रमाएगा [72]?"


[72] मुनाफ़िक़ों के कीने का बेनक़ाब होना

मुनाफ़िक़ों के दिलों में इस्लाम और नबी-ए-पाक ﷺ के ख़िलाफ़ जो बुग़्ज़ और हसद भरा था, वे समझते थे कि वे मीठी बातों के पीछे उसे हमेशा छुपाए रखेंगे। अल्लाह ने फ़रमाया कि उनका यह छुपा हुआ कीना एक दिन ज़रूर बेनक़ाब होकर रहेगा।

तफ़सीर ख़ज़ाइनुल इरफ़ान में हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि इस आयत के नाज़िल होने के बाद कोई भी मुनाफ़िक़ हुज़ूर अकरम ﷺ से छुपा न रहा; हुज़ूर ﷺ उनके चेहरों को देखकर ही उनके दिल के निफ़ाक़ को पहचान लेते थे।

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