Transliteration: (Innamal hayaatud dunyaa la'ibunw wa lahw; wa in tu'minoo wa tattaqoo yu'tikum ujoorakum wa laa yas'alkum amwaalakum)
"दुनिया की ज़िंदगी तो बस खेल और तमाशा है। और अगर तुम ईमान लाओ [88] और परहेज़गारी अपनाओ, तो वह तुम्हें तुम्हारे अज्र अता फ़रमाएगा [89] और तुमसे तुम्हारे सारे माल नहीं माँगेगा [90]।"
अगर इंसान आख़िरत को भुलाकर केवल दुनिया में मस्त हो जाए, तो यह ज़िंदगी खेल-तमाशे से ज़्यादा कुछ नहीं जो जल्द ही ख़त्म हो जाएगी। असली और बाक़ी रहने वाली ज़िंदगी आख़िरत की है जिसे अल्लाह और रसूल की इताअत में गुज़ारा जाए।
सच्चे मोमिन का सोना, जागना, चलना-फिरना, रोज़ी कमाना और अहलो-अयाल की देखरेख करना—सब कुछ अल्लाह की रज़ा की नीयत से इबादत का दर्जा पा लेता है और उस पर अज्र मिलता है।
अल्लाह तआला ने तुमसे तुम्हारा सारा माल नहीं माँगा, बल्कि सिर्फ़ एक छोटा सा हिस्सा (चालीसवाँ हिस्सा यानी 2.5% ज़कात के रूप में) फ़र्ज़ किया है। आम लोगों को अपनी सारी जायदाद ख़र्च करके फ़क़ीर बन जाने से भी मना फ़रमाया है। इस्लाम में आसानी और रहमत है।
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