कुरान - 47:36 सूरह मुहम्मद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

36
إِنَّمَا ٱلۡحَيَوٰةُ ٱلدُّنۡيَا لَعِبٞ وَلَهۡوٞۚ وَإِن تُؤۡمِنُواْ وَتَتَّقُواْ يُؤۡتِكُمۡ أُجُورَكُمۡ وَلَا يَسۡـَٔلۡكُمۡ أَمۡوَٰلَكُمۡ

Transliteration: (Innamal hayaatud dunyaa la'ibunw wa lahw; wa in tu'minoo wa tattaqoo yu'tikum ujoorakum wa laa yas'alkum amwaalakum)

दुनिया की ज़िंदगी तो बस खेल और तमाशा है। और अगर तुम ईमान लाओ [88] और परहेज़गारी अपनाओ, तो वह तुम्हें तुम्हारे अज्र अता फ़रमाएगा [89] और तुमसे तुम्हारे सारे माल नहीं माँगेगा [90]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह मुहम्मद आयत 36 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह मुहम्मद तफ़सीर - आयत 36

"दुनिया की ज़िंदगी तो बस खेल और तमाशा है। और अगर तुम ईमान लाओ [88] और परहेज़गारी अपनाओ, तो वह तुम्हें तुम्हारे अज्र अता फ़रमाएगा [89] और तुमसे तुम्हारे सारे माल नहीं माँगेगा [90]।"


[88] दुनिया की फ़ानी हक़ीक़त

अगर इंसान आख़िरत को भुलाकर केवल दुनिया में मस्त हो जाए, तो यह ज़िंदगी खेल-तमाशे से ज़्यादा कुछ नहीं जो जल्द ही ख़त्म हो जाएगी। असली और बाक़ी रहने वाली ज़िंदगी आख़िरत की है जिसे अल्लाह और रसूल की इताअत में गुज़ारा जाए।


[89] मोमिन की हर आदत इबादत बन जाती है

सच्चे मोमिन का सोना, जागना, चलना-फिरना, रोज़ी कमाना और अहलो-अयाल की देखरेख करना—सब कुछ अल्लाह की रज़ा की नीयत से इबादत का दर्जा पा लेता है और उस पर अज्र मिलता है।


[90] अल्लाह बंदों पर माली बोझ नहीं डालता

अल्लाह तआला ने तुमसे तुम्हारा सारा माल नहीं माँगा, बल्कि सिर्फ़ एक छोटा सा हिस्सा (चालीसवाँ हिस्सा यानी 2.5% ज़कात के रूप में) फ़र्ज़ किया है। आम लोगों को अपनी सारी जायदाद ख़र्च करके फ़क़ीर बन जाने से भी मना फ़रमाया है। इस्लाम में आसानी और रहमत है।

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