Transliteration: (Fahal yanzuroona illas Saa'ata an ta'tiyahum baghtatan faqad jaaa'a ashraatuhaa; fa annaa lahum izaa jaaa'at hum zikraahum)
"तो क्या वे बस इस बात का इंतज़ार कर रहे हैं [48] कि क़यामत उन पर अचानक आ जाए? तो बेशक उसकी निशानियाँ आ चुकी हैं [49]। फिर जब वह उन पर आ ही जाएगी, तो उन्हें नसीहत हासिल करने का मौक़ा कहाँ मिलेगा [50]?"
यहाँ मुनाफ़िक़ों और काफ़िरों से पूछा गया कि वे हक़ को क़बूल करने में और किस बात का इंतज़ार कर रहे हैं? क्या वे किसी नए नबी का इंतज़ार कर रहे हैं? वह तो मुमकिन नहीं, क्योंकि हुज़ूर मुहम्मद ﷺ के बाद कोई नबी नहीं आएगा। और अगर वे क़यामत के आने का इंतज़ार कर रहे हैं, तो क़यामत आने के बाद ईमान लाने या तौबा करने का कोई फ़ायदा नहीं होगा।
क़यामत की बुनियादी निशानियाँ ज़ाहिर हो चुकी हैं, जिनमें सबसे अज़ीम निशानी आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ का इस दुनिया में तशरीफ़ लाना है। हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया: "मेरी बेअ़सत और क़यामत इन दो उंगलियों की तरह मिली हुई हैं।" आपके मुअजिज़ात (जैसे शक्कुल क़मर यानी चाँद का दो टुकड़े होना) इस बात का खुला सुबूत हैं कि आख़िरी दौर शुरू हो चुका है।
जब क़यामत का ज़लज़ला आ जाएगा और आँखें पथरा जाएँगी, उस वक़्त हर मुनकिर को अपनी ग़लती का एहसास होगा, मगर उस वक़्त का एहसास और अफ़सोस कुछ काम न आएगा। अमल और तौबा का वक़्त सिर्फ़ दुनिया की ज़िंदगी तक है।
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