कुरान - 47:16 सूरह मुहम्मद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

16
وَمِنۡهُم مَّن يَسۡتَمِعُ إِلَيۡكَ حَتَّىٰٓ إِذَا خَرَجُواْ مِنۡ عِندِكَ قَالُواْ لِلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡعِلۡمَ مَاذَا قَالَ ءَانِفًاۚ أُوْلَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ طَبَعَ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمۡ وَٱتَّبَعُوٓاْ أَهۡوَآءَهُمۡ

Transliteration: (Wa minhum mai yastami'u ilaika hattaaa izaa kharajoo min 'indika qaaloo lil lazeena ootul 'ilma maazaa qaala aanifaa; ulaaa'ikal lazeena taba'al laahu 'alaa quloobihim wattaba'ooo ahwaaa'ahum)

और उनमें से कुछ वे हैं जो आपकी बात सुनते हैं [42], यहाँ तक कि जब आपके पास से बाहर निकलते हैं तो इल्म वालों से कहते हैं [43]: "उन्होंने अभी-अभी क्या कहा था [44]?" यही वे लोग हैं जिनके दिलों पर अल्लाह ने मुहर लगा दी है [45] और वे अपनी ख़्वाहिशात के पीछे चलते हैं [46]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह मुहम्मद आयत 16 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह मुहम्मद तफ़सीर - आयत 16

"और उनमें से कुछ वे हैं जो आपकी बात सुनते हैं [42], यहाँ तक कि जब आपके पास से बाहर निकलते हैं तो इल्म वालों से कहते हैं [43]: 'उन्होंने अभी-अभी क्या कहा था [44]?' यही वे लोग हैं जिनके दिलों पर अल्लाह ने मुहर लगा दी है [45] और वे अपनी ख़्वाहिशात के पीछे चलते हैं [46]।"


[42] मुनाफ़िक़ों का मजलिस-ए-नबवी में बैठना

यह आयत मुनाफ़िक़ों की मक्कारी और बेअदबी को बेनक़ाब करती है। वे हुज़ूर अकरम ﷺ की मुबारक मजलिस में जिस्मानी तौर पर तो बैठते थे, लेकिन उनका दिल और तवज्जोह हक़ को समझने के लिए नहीं, बल्कि ऐब तलाश करने और मज़ाक़ उड़ाने के लिए होती थी।


[43] इल्म वालों (सहाबा किराम) से मुराद

यहाँ 'इल्म वालों' से मुराद हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद, हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास और दीगर जलीलुल क़द्र सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम हैं, जो नबी-ए-पाक ﷺ के हर कलिमे को बड़े अदब और गहरे ध्यान से सुनते और याद रखते थे।


[44] मुनाफ़िक़ों का उपहास और मज़ाक़ उड़ाना

जब मुनाफ़िक़ बाहर निकलते तो सहाबा से तंज़ और उपहास के तौर पर पूछते कि "अभी इन्होंने क्या फ़रमाया था?" उनका मक़सद इल्म सीखना नहीं था, बल्कि यह जताना था कि हमने तो उनकी बात पर कोई ध्यान ही नहीं दिया।


[45] दिलों पर मुहर लगना

उनकी लगातार मुनाफ़िक़त, नबी ﷺ की शान में गुस्ताख़ी और बेअदबी की सज़ा के तौर पर अल्लाह ने उनके दिलों पर मुहर लगा दी, जैसे ज़हर खाने के बाद जिस्म बेकार हो जाता है। अब उनके दिलों में हिदायत और हक़ का दाख़िला असंभव हो चुका था।


[46] अहवा (नफ़्सानी ख़्वाहिशात) की पैरवी

ये लोग हक़ और शरीअत की जगह अपने नफ़्स की घटिया ख़्वाहिशात के पीछे चलते थे। जो इंसान नफ़्स का बंदा बन जाए, वह नबी की रहमत भरी आवाज़ से भी महरूम रह जाता है।

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