Transliteration: (Wa yaqoolul lazeena aamanoo law laa nuzzilat Sooratun fa izaaa unzilat Sooratum Muhkamatunw wa zukira feehal qitaalu ra aytal lazeena fee quloobihim maraduny yanzuroona ilaika nazaral maghshiyyi 'alaihi minal mawti fa'awlaa lahum)
"और ईमान वाले कहते हैं: 'कोई सूरह क्यों नाज़िल नहीं हुई?' फिर जब कोई साफ़ व दो-टूक सूरह नाज़िल की जाती है जिसमें जिहाद का ज़िक्र होता है [56], तो आप उन लोगों को जिनके दिलों में (निफ़ाक़ की) बीमारी है देखते हैं कि वे आपकी तरफ़ ऐसे देखते हैं जैसे मौत के ख़ौफ़ से किसी पर बेहोशी छा गई हो [57]! तो उनके लिए बर्बादी है [58]!"
सच्चे मोमिन अल्लाह की बारगाह में इबादत और शहादत के शौक़ में मुंतज़िर रहते थे कि कब जिहाद का हुक्म नाज़िल हो ताकि वे अपने रब की राह में जान कुर्बान कर सकें। लेकिन जब एक साफ़ और फ़ैसलाकुन सूरह नाज़िल हुई जिसमें काफ़िरों से क़िताल (लड़ाई) का खुला हुक्म था, तो मुनाफ़िक़ों के होश उड़ गए।
मुनाफ़िक़ों के दिलों में निफ़ाक़ और बुज़दिली की बीमारी थी। जब उन्होंने जिहाद का हुक्म सुना तो मौत के डर से उनके चेहरे की हवाइयाँ उड़ गईं और उनकी आँखें ऐसे चकराने लगीं जैसे किसी मरते हुए इंसान पर मौत की बेहोशी छा रही हो। वे ज़बान से मुसलमान होने का दावा तो करते थे, मगर दिल से जान की क़ुरबानी देने को तैयार न थे।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि ऐसी बुज़दिली और निफ़ाक़ पर उनके लिए सरासर हलाकत और रुसवाई है। अगर वे सच्चे दिल से इताअत करते तो यह उनके हक़ में बेहतर होता।
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