कुरान - 47:19 सूरह मुहम्मद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

19
فَٱعۡلَمۡ أَنَّهُۥ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا ٱللَّهُ وَٱسۡتَغۡفِرۡ لِذَنۢبِكَ وَلِلۡمُؤۡمِنِينَ وَٱلۡمُؤۡمِنَٰتِۗ وَٱللَّهُ يَعۡلَمُ مُتَقَلَّبَكُمۡ وَمَثۡوَىٰكُمۡ

Transliteration: (Fa'lam annahoo laaa ilaaha illal laahu wastaghfir lizambika wa lilmu'mineena walmu'minaat; wallaahu ya'lamu mutaqallabakum wa maswaakum (section 2))

तो (ऐ प्यारे रसूल!) जान लीजिए [51] कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं [52], और अपने ख़ास लोगों के गुनाहों की और आम मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों की मग़फ़िरत की दुआ फ़रमाइए [53] [54]। और अल्लाह तुम्हारी हरकतों (चलने-फिरने) और तुम्हारे ठहरने को ख़ूब जानता है [55]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह मुहम्मद आयत 19 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह मुहम्मद तफ़सीर - आयत 19

"तो (ऐ प्यारे रसूल!) जान लीजिए [51] कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं [52], और अपने ख़ास लोगों के गुनाहों की और आम मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों की मग़फ़िरत की दुआ फ़रमाइए [53] [54]। और अल्लाह तुम्हारी हरकतों (चलने-फिरने) और तुम्हारे ठहरने को ख़ूब जानता है [55]।"


[51] तौहीद का इल्म और यक़ीन

यह हुक्म ज़ाहिरी तौर पर हुज़ूर अकरम ﷺ को दिया गया है, लेकिन इसका मक़सद आम उम्मत को तालीम देना और तौहीद के अक़ीदे पर दृढ़ रखना है। हुज़ूर ﷺ तो वही के नाज़िल होने से पहले ही अल्लाह की तौहीद का कामिल इल्म रखते थे।


[52] हुज़ूर ﷺ का मुशाहिदा और आला इल्म

आम मोमिन तौहीद को सुनकर और मानकर जानते हैं, जबकि हुज़ूर अकरम ﷺ ने मेराज की रात बेहिजाब दीदार-ए-इलाही करके हक़ीक़ी मुशाहिदा फ़रमाया। इसलिए आम लोगों के जानने और हुज़ूर ﷺ के जानने के दरमियान ज़मीन व आसमान का फ़र्क़ है।


[53] नबी ﷺ की इस्मत और उम्मत के लिए शफ़ाअत व इस्तिग़फ़ार

तमाम अंबिया किराम मासूम होते हैं; उनसे गुनाह का सुदूर असंभव है। यहाँ 'इस्तिग़फ़ार' का हुक्म हुज़ूर ﷺ की शफ़ाअत और उम्मत के गुनाहों की बख़्शिश की सिफ़ारिश के लिए है। जिस तरह कोई बड़ा अपने मातहतों की ग़लती को अपनी कह कर मुआफ़ी माँगता है, उसी तरह हुज़ूर ﷺ अपनी उम्मत के गुनाहगारों के लिए बारगाह-ए-इलाही में रहमत व मग़फ़िरत की दुआ फ़रमाते हैं।


[54] उम्मत-ए-मुहम्मदिया का अज़ीम सम्मान

अल्लाह तआला ने अपने महबूब ﷺ को हुक्म दिया कि वे मोमिन मर्दों और औरतों के लिए मग़फ़िरत की दुआ करें। इससे साबित हुआ कि मोमिनों को अल्लाह की रहमत और मग़फ़िरत हुज़ूर ﷺ के वसीले और सिफ़ारिश से मिलती है। आक़ा ﷺ की शफ़ाअत के बग़ैर किसी की नजात नहीं।


[55] महबूब ﷺ पर रब की हर पल नज़र-ए-इनायत

आयत का आख़िरी हिस्सा हुज़ूर ﷺ की शान व अज़्मत का इज़हार है: अल्लाह तआला आपके उठने-बैठने, चलने-फिरने, दिन के कामों और रात के आराम के हर लम्हे से पूरी तरह वाक़िफ़ है। आप हर पल अल्लाह की हिफ़ाज़त और नज़र-ए-रहमत में हैं, जैसा कि फ़रमाया: "बेशक आप हमारी आँखों के सामने हैं" (सूरह अत-तूर, 52:48)।

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