Transliteration: (Fa'lam annahoo laaa ilaaha illal laahu wastaghfir lizambika wa lilmu'mineena walmu'minaat; wallaahu ya'lamu mutaqallabakum wa maswaakum (section 2))
"तो (ऐ प्यारे रसूल!) जान लीजिए [51] कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं [52], और अपने ख़ास लोगों के गुनाहों की और आम मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों की मग़फ़िरत की दुआ फ़रमाइए [53] [54]। और अल्लाह तुम्हारी हरकतों (चलने-फिरने) और तुम्हारे ठहरने को ख़ूब जानता है [55]।"
यह हुक्म ज़ाहिरी तौर पर हुज़ूर अकरम ﷺ को दिया गया है, लेकिन इसका मक़सद आम उम्मत को तालीम देना और तौहीद के अक़ीदे पर दृढ़ रखना है। हुज़ूर ﷺ तो वही के नाज़िल होने से पहले ही अल्लाह की तौहीद का कामिल इल्म रखते थे।
आम मोमिन तौहीद को सुनकर और मानकर जानते हैं, जबकि हुज़ूर अकरम ﷺ ने मेराज की रात बेहिजाब दीदार-ए-इलाही करके हक़ीक़ी मुशाहिदा फ़रमाया। इसलिए आम लोगों के जानने और हुज़ूर ﷺ के जानने के दरमियान ज़मीन व आसमान का फ़र्क़ है।
तमाम अंबिया किराम मासूम होते हैं; उनसे गुनाह का सुदूर असंभव है। यहाँ 'इस्तिग़फ़ार' का हुक्म हुज़ूर ﷺ की शफ़ाअत और उम्मत के गुनाहों की बख़्शिश की सिफ़ारिश के लिए है। जिस तरह कोई बड़ा अपने मातहतों की ग़लती को अपनी कह कर मुआफ़ी माँगता है, उसी तरह हुज़ूर ﷺ अपनी उम्मत के गुनाहगारों के लिए बारगाह-ए-इलाही में रहमत व मग़फ़िरत की दुआ फ़रमाते हैं।
अल्लाह तआला ने अपने महबूब ﷺ को हुक्म दिया कि वे मोमिन मर्दों और औरतों के लिए मग़फ़िरत की दुआ करें। इससे साबित हुआ कि मोमिनों को अल्लाह की रहमत और मग़फ़िरत हुज़ूर ﷺ के वसीले और सिफ़ारिश से मिलती है। आक़ा ﷺ की शफ़ाअत के बग़ैर किसी की नजात नहीं।
आयत का आख़िरी हिस्सा हुज़ूर ﷺ की शान व अज़्मत का इज़हार है: अल्लाह तआला आपके उठने-बैठने, चलने-फिरने, दिन के कामों और रात के आराम के हर लम्हे से पूरी तरह वाक़िफ़ है। आप हर पल अल्लाह की हिफ़ाज़त और नज़र-ए-रहमत में हैं, जैसा कि फ़रमाया: "बेशक आप हमारी आँखों के सामने हैं" (सूरह अत-तूर, 52:48)।
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