कुरान - 47:21 सूरह मुहम्मद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

21
طَاعَةٞ وَقَوۡلٞ مَّعۡرُوفٞۚ فَإِذَا عَزَمَ ٱلۡأَمۡرُ فَلَوۡ صَدَقُواْ ٱللَّهَ لَكَانَ خَيۡرٗا لَّهُمۡ

Transliteration: (Taa'atunw wa qawlum ma'roof; fa izaa 'azamal amru falaw sadaqul laaha lakaana khairal lahum)

हुक्म मानना और अच्छी बात कहना (उनके लिए बेहतर था)। फिर जब (जिहाद का) मामला पक्का हो गया [59], तो अगर वे अल्लाह से सच्चे रहते, तो यह उनके लिए बहुत बेहतर होता [60]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह मुहम्मद आयत 21 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह मुहम्मद तफ़सीर - आयत 21

"हुक्म मानना और अच्छी बात कहना (उनके लिए बेहतर था)। फिर जब (जिहाद का) मामला पक्का हो गया [59], तो अगर वे अल्लाह से सच्चे रहते, तो यह उनके लिए बहुत बेहतर होता [60]।"


[59] जंग का फ़ैसला तय होना ('अ़ज़मुल अम्र')

जब जंग और जिहाद का हुक्म पक्का और लागू हो गया, तो बहानेबाज़ी और हीले-हवाले करने का वक़्त ख़त्म हो गया। ऐसे वक़्त में मोमिन का काम सिर्फ़ हुक्म की तालीम और इताअत करना होता है।


[60] अल्लाह से सच्चाई और वादे की वफ़ादारी

अगर मुनाफ़िक़ अपने ईमान के दावे में सच्चे रहते और रसूलुल्लाह ﷺ के साथ मिलकर मैदान-ए-जंग में साबितक़दमी दिखाते, तो यह दुनिया में इज़्ज़त और आख़िरत में जन्नत की सूरत में उनके लिए बेहद फ़ायदेमंद होता। लेकिन उन्होंने बुज़दिली और मक्कारी चुनकर अपना ही नुक़सान किया।

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