Transliteration: (Fahal 'asaitum in tawallaitum an tufsidoo fil ardi wa tuqatti'ooo arhaamakum)
"तो क्या तुमसे यह उम्मीद की जाए कि अगर तुम्हें हुकूमत मिल जाए [61], तो तुम ज़मीन में फ़साद फैलाओगे और अपने रिश्ते-नातों को काट डालोगे [62]?"
इस आयत में मुनाफ़िक़ों और दुनियापरस्तों को मुख़ातब करके फ़रमाया गया कि अगर तुम्हें ज़मीन में ताक़त, हुकूमत या सरदारी मिल जाए, तो तुम्हारी फितरत यही है कि तुम ज़मीन में ज़ुल्म, फ़साद और ख़ून-ख़राबा मचाओगे, जैसा कि ज़माना-ए-जहालत में करते थे।
ज़मीन में फ़साद मचाने के साथ-साथ रिश्तेदारों के हुकूक़ को पामाल करना और रिश्ते-नाते तोड़ना इंतहाई घिनौना गुनाह है। इस्लाम सिला-ए-रहमी (रिश्तेदारों से भलाई) पर बहुत ज़ोर देता है और क़ता-ए-रहमी करने वाले पर अल्लाह की लानत नाज़िल होती है।
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