Transliteration: (Wa qaalal lazeena kafaroo lan nu'mina bihaazal Quraani wa laa billazee baina yadayh; wa law taraaa iziz zaalimoona mawqoofoona 'inda Rabbihim yarji'u ba'duhum ilaa ba'dinil qawla yaqoolul lazeenas tud'ifoo lillazeenas takbaroo law laaa antum lakunnaa mu'mineen)
"और काफ़िरों ने कहा: 'हम हरगिज़ न तो इस क़ुरआन पर ईमान लाएंगे और न उन किताबों पर जो इससे पहले थीं [95]।' और काश आप देखें जब ये ज़ालिम अपने रब के सामने खड़े किए जाएंगे [96], तो वे एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगाते होंगे। जो लोग कमज़ोर समझे जाते थे वे बड़े बनने वालों से कहेंगे: 'अगर तुम न होते [97], तो हम ज़रूर ईमान वाले होते [98]!'"
काफ़िरों की सरकशी सिर्फ़ क़ुरआने मजीद तक महदूद न थी, बल्कि वे पिछली तमाम आसमानी किताबों जैसे तौरात, इंजील और ज़बूर का भी साफ़ इनकार करते थे। यह हर दौर की इलाही हिदायत के मुकम्मल इनकार का इज़हार है। इस्लाम में पिछली तमाम सच्ची आसमानी किताबों पर ईमान लाना फ़र्ज़ और लाज़िमी है, बशर्ते कि उन्हें उनकी अस्ल और ग़ैर-मुहर्रफ़ शक्ल में माना जाए।
यह आयत क़यामत के दिन का रूह-फ़रसा मंज़र खींचती है जब काफ़िरों और ज़ालिमों को ज़बरदस्ती बारगाह-ए-इलाही में पेश किया जाएगा। ईमान वाले खुशी और वक़ार के साथ हाज़िर होंगे, जबकि ये मुनकिरीन ज़िल्लत और बे-बसी में गर्दनें झुकाए खड़े होंगे। दुनिया में उनका झूठा घमंड और तकब्बुर आख़िरत में मुकम्मल लाचारी और अफ़सोस में बदल जाएगा।
महशर में कमज़ोर और पैरवी करने वाले अवाम अपने उन दौलतमंद और मुतकब्बिर सरदारों पर टूट पड़ेंगे जिनकी वे दुनिया में अंधी पैरवी करते थे। वे कहेंगे: "अगर तुम्हारा दबाव और बहकावा न होता, तो हम ज़रूर ईमान ले आते।"
इससे वाज़ेह होता है कि अगरचे गुमराह करने वाले सरदार मुजरिम हैं, मगर उनकी अंधी पैरवी करने वाले भी सज़ा से बच नहीं सकेंगे। हर इंसान हक़ को तलाश करने और सही फ़ैसला लेने का ख़ुद ज़िम्मेदार है। दुनिया के बातिल गठजोड़ हश्र में टूट जाएंगे और वे एक-दूसरे पर लानत भेजेंगे।
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