Transliteration: (Wa qaalal lazeenastud'ifoo lillazeenas takbaroo bal makrul laili wannahaari iz ta'muroonanaaaa an nakfura billaahi wa naj'ala lahooo andaadaa; wa asarrun nadaamata lammaa ra awul 'azaab; wa ja'alnal aghlaala feee a'naaqil lazeena kafaroo; hal yujzawna illaa maa kaanoo ya'maloon)
"और वे कमज़ोर लोग [101] उन बड़े बनने वालों से कहेंगे: 'नहीं, बल्कि तुम्हारी रात और दिन की साज़िशें थीं [102] जब तुम हमें हुक्म देते थे कि हम अल्लाह का इनकार करें और उसके लिए शरीक ठहराएं [103]।' और जब वे अज़ाब को देखेंगे तो अपनी नदामत को छुपाएंगे [104]। और हमने काफ़िरों की गर्दनों में तौक़ डाल दिए हैं [105]। उन्हें वही बदला दिया जाएगा जो वे करते रहे थे [106]।"
कमज़ोर और बे-इख़्तियार लोग—जो माली या सामाजी तौर पर मुतकब्बिरों के दबाव में थे—अपने सरदारों पर इल्ज़ाम लगाएंगे कि उन्होंने अपने रसूख़ का ग़लत इस्तेमाल करके उन्हें हक़ से महरूम रखा। यह अंधी पैरवी के भयानक अंजाम का इज़हार है।
मुतकब्बिर सरदार दिन-रात बातिल की तब्लीग़ और साज़िशों में मसरूफ़ रहते थे ताकि लोग इस्लाम की तरफ़ मायल न हों। वे अपने मकर व फ़रेब से कुफ़्र को दिलकश बनाकर पेश करते थे, जिससे उनकी मुजरिमाना हैसियत और बढ़ जाती है।
उनका अस्ल जुर्म यह था कि वे लोगों को शिर्क और बुत-परस्ती की दावत देते थे। रसूलुल्लाह ﷺ की नबुव्वत का इनकार दर-हक़ीक़त अल्लाह की बारगाह से बगावत है।
जब दोज़ख़ का अज़ाब सामने आ खड़ा होगा, तो वे शर्मिंदगी और नदामत से पानी-पानी हो जाएंगे और अपनी नदामत को छुपाने की नाकाम कोशिश करेंगे, मगर अल्लाह उनकी हर पोशीदा बात को ज़ाहिर फ़रमा देगा।
काफ़िरों की गर्दनों में आग के भारी तौक़ और ज़ंजीरें डाल दी जाएंगी जो उनकी दायमी रुस्वाई की निशानी होंगी। यह ज़िल्लत-आमेज़ सज़ा सिर्फ़ मुनकिरीने हक़ के लिए मख़सूस है।
हर शख़्स को उसके किए का पूरा-पूरा बदला मिलेगा। अल्लाह किसी पर ज़ुल्म नहीं फ़रमाता; अज़ाब उन्हीं को मिलेगा जिन्होंने कुफ़्र व गुनाह किए, जबकि अहले ईमान को अल्लाह अपने फ़ज़्ल से जन्नत की दायमी नेमतें अता फ़रमाएगा।
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