कुरान - 34:34 सूरह सबअ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

34
وَمَآ أَرۡسَلۡنَا فِي قَرۡيَةٖ مِّن نَّذِيرٍ إِلَّا قَالَ مُتۡرَفُوهَآ إِنَّا بِمَآ أُرۡسِلۡتُم بِهِۦ كَٰفِرُونَ

Transliteration: (Wa maaa arsalnaa' fee qaryatin min nazeerin illaa qaala mutrafoohaa innaa bimaaa ursiltum bihee kaafiroon)

और हमने किसी भी बस्ती में कोई डराने वाला (पैग़म्बर) नहीं भेजा मगर उसके खाते-पीते (अमीर व मुतकब्बिर) लोगों [107] ने यही कहा कि "जो पैग़ाम देकर तुम भेजे गए हो हम उसके मुनकिर हैं [108]!" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह सबअ आयत 34 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह सबा तफ़सीर - आयत 34

"और हमने किसी भी बस्ती में कोई डराने वाला नहीं भेजा मगर उसके अमीर लोगों ने यही कहा [107]: 'जो पैग़ाम देकर तुम भेजे गए हो हम उसके मुनकिर हैं [108]।'"

[107] मुतरफ़ीन (दौलतमंद मुतकब्बिरों) का तकब्बुर

तारीख़े इंसानी का यह मुस्तक़िल मामूल रहा है कि दौलतमंद और मुतकब्बिर तबक़े ने हमेशा सबसे पहले अंबिया-ए-किराम की मुख़ालफ़त की। दुनियावी ऐश व आराम और दौलत के नशे ने उनकी आंखों पर पर्दा डाल दिया। इसके बर-अक्स ग़रीब और मिस्कीन लोग सबसे पहले ईमान लाए क्योंकि उनके दिलों में दुनिया का घमंड कम था। दौलत जब तक़वे के साथ हो (जैसे हज़रत उस्माने ग़नी रज़ियल्लाहु अन्हु की दौलत) तो रहमत है, मगर जब तकब्बुर पैदा करे तो हलाकत है।

[108] शान-ए-नुज़ूल और पिछली किताबों की गवाही

रिवायत में है कि अहदे रिसालत में दो ताजिर शरीक थे—एक शाम में और दूसरा मक्का में। जब मक्का वाले ने लिखा कि मुहम्मद ﷺ ने नबुव्वत का दावा किया है मगर सिर्फ़ ग़रीब लोग उन पर ईमान ला रहे हैं, तो शाम के ताजिर ने—जो पिछली किताबों का आलिम था—कहा: "सच्चे नबियों की यही निशानी किताबों में दर्ज है कि इब्तिदा में ग़रीब ही उनकी पैरवी करते हैं।" चुनांचे वह मक्का आकर मुसलमान हो गया। यह आयत इसी हक़ीक़त की तस्दीक़ फ़रमाती है।

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