Transliteration: (Wa yaqooloona mataa haazal wa'du in kuntum saadiqeen)
"और वे कहते हैं: 'यह वादा कब पूरा होगा अगर तुम सच्चे हो?' [93]"
काफ़िरों का यह सवाल कि "क़यामत कब आएगी?" किसी तहक़ीक़ या तलबे हक़ के लिए न था, बल्कि वे मज़ाक़ उड़ाने और झुठलाने के अंदाज़ में तअन्नात करते थे। वे समझते थे कि अगर वक़्त मुअय्यन नहीं बताया गया तो गोया क़यामत आएगी ही नहीं। उनकी इस ना-समझी की वजह से क़ुरआन ने उन्हें कोई तारीख़ नहीं बताई, क्योंकि क़यामत का सही वक़्त अल्लाह ही के इल्म में महफ़ूज़ है।
अहादीसे मुबारका में हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ ने मोमिनों की रहनुमाई के लिए क़यामत की तमाम निशानियां (अख़्लाक़ी ज़वाल, ना-इंसाफ़ी, दज्जाल का ज़हूर, हज़रत ईसा का नुज़ूल) बयान फ़रमा दी हैं, और रिवायत में है कि क़यामत जुमे के दिन 10 मुहर्रम (आशूरा) को बरपा होगी। यह इल्म मोमिनीन की तंबीह व तैयारी के लिए दिया गया है, न कि मुनकिरीन के मज़ाक़ का जवाब देने के लिए।
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