Transliteration: (Qul inna Rabbee yaqzifu bilhaqq 'Allaamul Ghuyoob)
"आप कह दीजिए: 'बेशक मेरा रब हक़ को नाज़िल फ़रमाता है [142], जो सच्चा है [143]; वह तमाम ग़ैब की बातों का ख़ूब जानने वाला है।'"
यह आयत वाज़ेह फ़रमाती है कि क़ुरआन के नुज़ूल से पहले भी हक़ हुज़ूर ﷺ के क़ल्बे मुबारक़ में मौजूद था। अल्लाह ने अपने महबूब को अज़ल ही से हक़ व सदाक़त का मुजस्समा बनाया है।
यहाँ "हक़" से मुराद क़ुरआने पाक, दीने इस्लाम और ख़ुद हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की ज़ात है। जिस तरह सोने की कान से सिर्फ़ ख़ालिस सोना निकलता है, उसी तरह हुज़ूर ﷺ के हर क़ौल व अमल से सिर्फ़ हक़ सादिर होता है।
अल्लाह तआला तमाम पोशीदा और ग़ैबी हक़ायक़ का मुकम्मल इल्म रखता है; वही अपने रसूल की सच्चाई पर सबसे बड़ा गवाह है।
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