Transliteration: (Qul jaaa'al haqqu wa maa yubdi'ul baatilu wa maa yu'eed)
"आप कह दीजिए: 'हक़ आ गया, और बातिल न तो कोई नई चीज़ पैदा कर सकता है और न दोबारा लौटा सकता है [144]!'"
फ़तहे मक्का के रोज़ हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ ने ख़ाना-ए-काबा में दाख़िल होकर 360 बुतों को अपनी छड़ी के इशारे से गिराते हुए इसी आयत की तिलावत फ़रमाई थी। हक़ के आ जाने के बाद बातिल बे-जान, बे-असर और ज़लील हो गया।
इस मुबारक फ़रमान की बरकत से मक्का मुकर्रमा और मदीना मुनव्वरा में क़यामत तक कभी शिर्क व बुत-परस्ती दोबारा क़ायम नहीं हो सकती; ख़ाना-ए-काबा हमेशा के लिए तौहीद का मरकज़ बन चुका है।
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