कुरान - 34:46 सूरह सबअ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

46
۞قُلۡ إِنَّمَآ أَعِظُكُم بِوَٰحِدَةٍۖ أَن تَقُومُواْ لِلَّهِ مَثۡنَىٰ وَفُرَٰدَىٰ ثُمَّ تَتَفَكَّرُواْۚ مَا بِصَاحِبِكُم مِّن جِنَّةٍۚ إِنۡ هُوَ إِلَّا نَذِيرٞ لَّكُم بَيۡنَ يَدَيۡ عَذَابٖ شَدِيدٖ

Transliteration: (Qul innamaaa a'izukum biwaahidatin an taqoomoo lillaahi masnaa wa furaadaa summa tatafakkaroo; maa bisaahibikum min jinnah; in huwa illaa nazeerul lakum baina yadai 'azaabin shadeed)

आप कह दीजिए, "मैं तुम्हें सिर्फ़ एक बात की नसीहत करता हूँ [134] कि तुम अल्लाह के लिए दो-दो और अकेले-अकेले खड़े हो जाओ [135], फिर ग़ौर व फ़िक्र करो [136]; तुम्हारे साथी (मुहम्मद ﷺ) में कोई जुनून (दीवानगी) नहीं है [137]; वे तो बस एक सख़्त अज़ाब के आने से पहले [138] तुम्हें डराने वाले हैं।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह सबअ आयत 46 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह सबा तफ़सीर - आयत 46

"आप कह दीजिए: 'मैं तुम्हें सिर्फ़ एक बात की नसीहत करता हूँ [134] कि तुम अल्लाह के लिए दो-दो और अकेले-अकेले खड़े हो जाओ [135], फिर ग़ौर व फ़िक्र करो [136]। तुम्हारे साथी में कोई जुनून नहीं है [137]; वे तो बस एक सख़्त अज़ाब के आने से पहले [138] तुम्हें डराने वाले हैं।'"

[134] एक ख़ास नसीहत की अज़ीम तासीर

यह आयत तालीम देती है कि इख़्लास के साथ की गई एक ही नसीहत इंसान के दिल में ईमान, मारिफ़त और तक़वे का नूर पैदा करने के लिए काफ़ी हो सकती है। हक़ की बात जब संजीदगी से सुनी जाए तो वह रूह को बेदार कर देती है।

[135] अल्लाह के लिए मजलिसें बरपा करना और तन्हाई में सोचना

"अल्लाह के लिए खड़े हो जाओ" से मुराद यह है कि दीनी ख़ैर-ख़्वाही और हक़ की तलाश के लिए बैठना या जमा होना ऐन इबादत है। हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि मजमे के शोर और तअस्सुब से निकल कर दो-दो मिलकर या तन्हाई में संजीदगी से फ़िक्र करो, क्योंकि तन्हाई का ग़ौर व फ़िक्र इंसान को हक़ीक़त तक जल्दी पहुँचाता है।

[136] हुज़ूर ﷺ की हयात और सीरत पर तफ़क्कुर

हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की मुबारक सीरत और अहवाल पर ग़ौर व तफ़क्कुर करना ऐन इबादत है। सूफ़िया-ए-किराम फ़रमाते हैं कि हक़ीक़त पर एक लम्हे का तफ़क्कुर बग़ैर समझ की हज़ार साल की रस्मी इबादत से बेहतर है।

[137] हुज़ूर ﷺ की इस्मत और जुनून के बोहतान का रद्द

क़ुरआन साफ़ ऐलान फ़रमाता है कि चालीस साल तुम्हारे दरमियान सादिक़ व अमीन की हैसियत से ज़िंदगी गुज़ारने वाले प्यारे रसूल ﷺ हर क़िस्म के जुनून और नुक़्स से पाक हैं। आपका हर अमल अक़्ले कामिल और हिकमते इलाही का आईना है।

[138] सख़्त अज़ाब से पहले तंबीह

"सख़्त अज़ाब" से मुराद दुनियावी हलाकत (जैसे जंगे बद्र में मुशरिकीन की ज़िल्लत), मौत की सख़्ती, या आख़िरत का दायमी दोज़ख़ है। हुज़ूर ﷺ इंसानों पर रऊफ़ व रहीम बनकर आए हैं ताकि उन्हें इस अज़ाब से बचा लें।

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