Transliteration: (Afalam yaraw ilaa maa baina aydeehim wa maa khalfahum minas samaaa'i wal ard; in nashad nakhsif bihimul arda aw nusqit 'alaihim kisafam minas samaaa'; inna fee zaalika la Aayatal likulli 'abdim muneeb (section 1))
"क्या उन्होंने उस को नहीं देखा जो उनके आगे और उनके पीछे है आसमान और ज़मीन में से [27]? अगर हम चाहें तो उन्हें ज़मीन में धंसा दें [28] या उन पर आसमान का कोई टुकड़ा गिरा दें; बेशक इसमें हर उस बंदे के लिए बड़ी निशानी है जो रुजूअ करने वाला हो [29]।"
यह आयत मुनकिरीन को याद दिलाती है कि वे अल्लाह की मख़लूक़ात और उसकी बादशाही के घेरे में महसूर हैं—आगे, पीछे, ऊपर और नीचे, हर तरफ़ ज़मीन और आसमान फैले हुए हैं। वे अल्लाह की ज़मीन पर बसते हैं और उसके आसमान की छत तले रहते हैं, फिर भी उसके नबी की मुख़ालफ़त करते हैं! यह उनके इन्तिहाई बे-बस होने की खुली दलील है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है कि अगर वह चाहे तो उन्हें क़ारून की तरह ज़मीन में धंसा दे या आसमान से अज़ाब का कोई टुकड़ा उन पर गिरा दे। यह कोई ख़्याली बात नहीं, बल्कि अल्लाह की क़ुदरत मुतलक़ है; पिछली उम्मतों पर ऐसे अज़ाब नाज़िल हो चुके हैं और क़यामत के दिन भी कायनात का यह निज़ाम बदल दिया जाएगा।
यह कुदरती निशानियां और अज़ाब की चेतावनियां हर एक के लिए नहीं, बल्कि उन्हीं बंदों के लिए इबरत व रहनुमाई का ज़रिया बनती हैं जो 'मुनीब' यानी अल्लाह की तरफ़ आजिज़ी और तौबा के साथ रुजूअ करने वाले हैं। ऐसे ही साहेबाने ईमान अल्लाह की अज़मत को पहचानते हैं और उसकी पकड़ से डरते हैं।
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