Transliteration: (Yawma 'izil laa tanfa'ush shafaa'atu illaa man azina lahur Rahmaanu wa radiya lahoo qawlaa)
"उस दिन किसी की शफ़ाअत काम न देगी [152] सिवाए उसके जिसे रहमान ने इजाज़त दी हो [153] और जिसकी बात वह पसंद फ़रमाए।"
काफ़िरों के लिए क़ियामत के दिन किसी की कोई शफ़ाअत न होगी। शफ़ाअत सिर्फ़ अहले ईमान के गुनाहों की बख़्शिश के लिए होगी।
हमारे प्यारे नबी (ﷺ) को अल्लाह तआला ने शफ़ीउल मुज़्निबीन (गुनहगारों का शफ़ीअ) बनाया है। महशर में जब सब नबी 'नफ़्सी-नफ़्सी' कहेंगे, हुज़ूर (ﷺ) सजदे में गिरकर अपनी उम्मत के लिए शफ़ाअत फ़रमाएंगे और रब फ़रमाएगा: "ऐ महबूब! सर उठाइए, कहिए सुना जाएगा, मांगिए दिया जाएगा, शफ़ाअत कीजिए क़बूल होगी।"
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