कुरान - 20:12 सूरह ता-हा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

12
إِنِّيٓ أَنَا۠ رَبُّكَ فَٱخۡلَعۡ نَعۡلَيۡكَ إِنَّكَ بِٱلۡوَادِ ٱلۡمُقَدَّسِ طُوٗى

Transliteration: (Inneee Ana Rabbuka fakhla' na'laika innaka bilwaadil muqaddasi Tuwaa)

12. 'बेशक मैं ही तुम्हारा रब हूँ [12]! पस अपने जूते उतार दीजिए; बेशक आप मुक़द्दस वादी 'तुवा' में हैं [13]।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह ता-हा आयत 12 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ता-हा — आयत 12 की तफ़सीर

" 'बेशक मैं ही तुम्हारा रब हूँ [12]! पस अपने जूते उतार दीजिए; बेशक आप मुक़द्दस वादी 'तुवा' में हैं [13]।' "

[12] दरख़्त से कलाम-ए-इलाही का इज़हार

आवाज़ दरख़्त की सिम्त से पैदा हुई, लेकिन वह दरख़्त खुद अल्लाह नहीं था। बल्कि वह दरख़्त कलाम-ए-इलाही के इज़हार का ज़रिया बना—जैसे रेडियो से बोलने वाले की आवाज़ आती है, हालांकि वह आला खुद बोलने वाला नहीं होता।

इसी तरह जो बुज़ुर्गाने दीन इलाही जज़्ब और फ़ना के आलम में "अनल हक़" या "या सुब्हानी मा आज़मा शानी" जैसे कलिमात कह बैठे, उन्होंने यह दावे या तकब्बुर से नहीं कहा, बल्कि इलाही तजल्ली के ग़लबा में उनके मुँह से यह कलिमात जारी हुए।

[13] वादी-ए-तुवा का अदब और एहकाम

इस आयत से तीन अहम अहकाम साबित होते हैं:

  1. मुक़द्दस मक़ामात (जैसे मक्का और मदीना के हरम) का अदब व एहतिराम लाज़िम है क्योंकि वह अल्लाह की बाबरकत ज़मीनें हैं।

  2. ऐसे मुक़द्दस मक़ामात पर जूते उतारना अंबिया-ए-किराम की सुन्नत है। लिहाज़ा मस्जिद में दाख़िल होते वक़्त जूते उतारना मुस्तहब व पसंदीदा है।

  3. हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) को जूते उतारने का हुक्म दिया गया, लेकिन शब-ए-मेराज में हमारे नबी करीम (ﷺ) को अर्श-ए-आज़म पर भी जूते उतारने का हुक्म नहीं दिया गया, जो हुज़ूर (ﷺ) की बेमिसाल अज़मत की दलील है।

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