Transliteration: (Fa akalaa minhaa fabadat lahumaa saw aatuhumaa wa tafiqaa yakhsifaani 'alaihimaa minw waraqil jannah; wa 'asaaa Aadamu Rabbahoo faghawaa)
"तो उन दोनों ने उस दरख़्त से खा लिया, तो उनकी शर्मगाहें उन पर ज़ाहिर हो गईं [169], और वे अपने ऊपर जन्नत के पत्ते चिपकाने लगे [170]; और आदम से अपने रब के हुक्म में लग़्ज़िश हुई, फिर जो उन्होंने चाहा था उसकी राह न पाई [171] ।"
फल चखते ही जन्नती लिबास उतर गया। इससे साबित हुआ कि शर्मो-हया और सत्र छुपाना फ़ितरते इंसानी और सुन्नते अंबिया है। मियाँ-बीवी को भी एक-दूसरे के सामने बिला ज़रूरत पूरी तरह नंगा नहीं होना चाहिए।
हज़रत आदम और सय्यिदा हव्वा ने इंजीर के चौड़े पत्तों से अपने जिस्मों को ढांका।
अंबिया के हक़ में लफ़्ज़े लग़्ज़िश या भूल गुनाह के मफ़हूम में नहीं होती। जैसे उर्दू में 'बैठना' आँख के साथ आने पर अंधा होना और गले के साथ आवाज़ बैठना कहलाता है, उसी तरह अंबिया की निस्बत से अल्फ़ाज़ के मायने उनकी शान के शायाने शान लिए जाते हैं।
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