कुरान - 20:15 सूरह ता-हा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

15
إِنَّ ٱلسَّاعَةَ ءَاتِيَةٌ أَكَادُ أُخۡفِيهَا لِتُجۡزَىٰ كُلُّ نَفۡسِۭ بِمَا تَسۡعَىٰ

Transliteration: (Innas Saa'ata aatiyatun akaadu ukhfeehaa litujzaa kullu nafsin bimaa tas'aa)

15. 'बेशक क़ियामत आने ही वाली है। क़रीब था कि मैं उसे सबसे पोशीदा (छुपाकर) रखता [16] ताकि हर जान को उसका बदला दिया जाए जो वह कोशिश करती है।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह ता-हा आयत 15 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ता-हा — आयत 15 की तफ़सीर

" 'बेशक क़ियामत आने ही वाली है। क़रीब था कि मैं उसे सबसे पोशीदा रखता [16] ताकि हर जान को उसका बदला दिया जाए जो वह कोशिश करती है।' "

[16] क़ियामत का इल्म और उसकी निशानियां

अल्लाह तआला ने क़ियामत को पूरी तरह पोशीदा नहीं रखा, बल्कि अपने अंबिया के ज़रिए इसके आने की ख़बर और अहम अलामतें (निशानियां) उम्मत को बता दीं ताकि लोग इसकी तैयारी कर सकें।

अगरचे साल और महीना मख़फ़ी रखा, लेकिन नबी करीम (ﷺ) को दिन का इल्म अता फ़रमाया कि क़ियामत जुमे के दिन और एक रिवायत के मुताबिक़ 10 मुहर्रम (आशूरा) को क़ायम होगी।

हुज़ूर (ﷺ) ने अपनी शहादत और बीच की उंगली को मिलाकर फ़रमाया: "मैं और क़ियामत इन दो उंगलियों की तरह भेजे गए हैं।" यानी जैसे पड़ोसी अपने पड़ोसी को जानता है, आप क़ियामत के क़रीब होने से बख़ूबी वाक़िफ़ हैं।

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