कुरान - 20:37 सूरह ता-हा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

37
وَلَقَدۡ مَنَنَّا عَلَيۡكَ مَرَّةً أُخۡرَىٰٓ

Transliteration: (Wa laqad manannaa 'alaika marratan ukhraaa)

37. 'और बेशक हमने तुम पर एक बार और एहसान फ़रमाया था [33];' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह ता-हा आयत 37 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ता-हा — आयत 37 की तफ़सीर

" 'और बेशक हमने तुम पर एक बार और एहसान फ़रमाया था [33];' "

[33] नेमतों की याददेहानी: एहसान जताना नहीं बल्कि शुक्रगुज़ारी

यहाँ 'मन्ना' का लफ़्ज़ मेहरबानी व करम फ़रमाने के मफ़हूम में है, एहसान जताकर शर्मिंदा करने के लिए नहीं।

याद रहे कि अल्लाह तआला और उसके हबीब (ﷺ) का एहसान याद दिलाना बंदों में शुक्रगुज़ारी और मुहब्बत पैदा करने के लिए होता है, जबकि आम इंसान जब एहसान जताता है तो उससे दूसरे को तकलीफ़ और ज़िल्लत महसूस होती है। इसी वजह से इंसानों को एहसान जताने से मना किया गया है।

मक़सद यह है कि ऐ मूसा! जो नबूवत आज हमने तुम्हें दी, यह भी हमारा एहसान है, और पहले जो तुम्हें फ़िरऔन के क़त्ल से बचाया था, वह भी हमारा ही करम था।

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