कुरान - 36:11 सूरह या-सीन अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

11
إِنَّمَا تُنذِرُ مَنِ ٱتَّبَعَ ٱلذِّكۡرَ وَخَشِيَ ٱلرَّحۡمَٰنَ بِٱلۡغَيۡبِۖ فَبَشِّرۡهُ بِمَغۡفِرَةٖ وَأَجۡرٖ كَرِيمٍ

Transliteration: (Innamaa tunziru manit taba 'az-Zikra wa khashiyar Rahmaana bilghaib, fabashshirhu bimaghfiratinw-wa ajrin kareem)

आप तो बस उसी को डरा सकते हैं जो नसीहत की पैरवी करे [10] और बे-देखे रहमान से डरे [11]; पस आप उसे मग़फ़िरत और बा-इज़्ज़त अज्र की ख़ुशख़बरी दे दीजिए [12]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह या-सीन आयत 11 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह या-सीन तफ़सीर - आयत 11

"आप तो बस उसी को डरा सकते हैं जो नसीहत की पैरवी करे [10] और बे-देखे रहमान से डरे [11]; पस आप उसे मग़फ़िरत और बा-इज़्ज़त अज्र की ख़ुशख़बरी दे दीजिए [12]!"

[10] ग़ौर व तफ़क्कुर — हिदायत की पहली सीढ़ी

जो लोग क़ुरआने मजीद की आयतों और हुज़ूर ﷺ के इरशादात पर संजीदगी से ग़ौर करते हैं, वे हक़ को पहचान कर ईमान और नेक आमाल की तरफ़ क़दम बढ़ाते हैं। पहले तफ़क्कुर आता है, फिर ईमान और फिर अमल।

[11] बे-देखे रहमान का ख़ौफ़

मोमिन की शान यह है कि वह तन्हाई में भी, जब कोई देखने वाला न हो, अल्लाह की अज़मत और उसके अज़ाब से डरता है। रहमान की सिफ़त के साथ ख़ौफ़ का ज़िक्र यह सिखाता है कि रहमते इलाही की उम्मीद के साथ-साथ उसकी पकड़ का ख़ौफ़ भी ईमान का लाज़मी हिस्सा है (रूहुल मआनी)।

[12] बख़्शिश और अज़ीम अज्र

'अज्रिन करीम' से मुराद दुनिया की बा-इज़्ज़त नेमतें और आख़िरत में जन्नत की दायमी राहतें हैं। जो दिल ख़ुदा के ख़ौफ़ और मुस्तफ़ा ﷺ की इताअत से आबाद है, वह दोनों जहानों में कामियाब है।

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