Transliteration: (Innamaa tunziru manit taba 'az-Zikra wa khashiyar Rahmaana bilghaib, fabashshirhu bimaghfiratinw-wa ajrin kareem)
"आप तो बस उसी को डरा सकते हैं जो नसीहत की पैरवी करे [10] और बे-देखे रहमान से डरे [11]; पस आप उसे मग़फ़िरत और बा-इज़्ज़त अज्र की ख़ुशख़बरी दे दीजिए [12]!"
जो लोग क़ुरआने मजीद की आयतों और हुज़ूर ﷺ के इरशादात पर संजीदगी से ग़ौर करते हैं, वे हक़ को पहचान कर ईमान और नेक आमाल की तरफ़ क़दम बढ़ाते हैं। पहले तफ़क्कुर आता है, फिर ईमान और फिर अमल।
मोमिन की शान यह है कि वह तन्हाई में भी, जब कोई देखने वाला न हो, अल्लाह की अज़मत और उसके अज़ाब से डरता है। रहमान की सिफ़त के साथ ख़ौफ़ का ज़िक्र यह सिखाता है कि रहमते इलाही की उम्मीद के साथ-साथ उसकी पकड़ का ख़ौफ़ भी ईमान का लाज़मी हिस्सा है (रूहुल मआनी)।
'अज्रिन करीम' से मुराद दुनिया की बा-इज़्ज़त नेमतें और आख़िरत में जन्नत की दायमी राहतें हैं। जो दिल ख़ुदा के ख़ौफ़ और मुस्तफ़ा ﷺ की इताअत से आबाद है, वह दोनों जहानों में कामियाब है।
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