Transliteration: (Wa maa liya laaa a'budul lazee fataranee wa ilaihi turja'oon)
"और मुझे क्या हुआ है कि मैं उस ज़ात की इबादत न करूँ जिसने मुझे पैदा किया [31], और उसी की तरफ़ तुम सब पलटाए जाओगे [32]?"
जब क़ौम ने हज़रत हबीब नज्जार के ईमान पर एतराज़ किया, तो उन्होंने अपनी फ़ितरत से दलील दी कि जिस रब्बे करीम ने मुझे अदम (ना-पैद) से वजूद बख़्शा, और अपने रसूलों के वसीले से मुझे ईमान की हिदायत अता फ़रमाई, उसकी इबादत न करना अक़्ल और इंसाफ़ के ख़िलाफ़ है। यह बंदगी का पहला और बुनियादी तक़ाज़ा है।
उन्होंने क़ौम को याद दिलाया कि चाहे तुम मानो या न मानो, तुम सबको मजबूरन अल्लाह ही की बारगाह में पेश होना है। हबीब नज्जार ने फ़रमाया कि मैं तो अपनी ख़ुशी और मोहब्बत से उसकी तरफ़ रुजू कर रहा हूँ, जबकि मुनकिरीन ज़िल्लत के साथ अदालत में घसीट कर लाए जाएंगे।
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