Transliteration: (Wa jaaa'a min aqsal madeenati rajuluny yas'aa qaala yaa qawmit tabi'ul mursaleen)
"और शहर के दूर वाले किनारे से एक शख़्स दौड़ता हुआ आया [30]; उसने कहा: 'ऐ मेरी क़ौम! रसूलों की पैरवी करो!'"
यह हज़रत हबीब नज्जार (मोमिने आले यासीन) थे। वे शहर से बारह मील दूर एक ग़ार में अल्लाह की इबादत में मसरूफ़ रहते थे। जब उन्हें ख़बर मिली कि बस्ती वाले रसूलों को क़त्ल करने की साज़िश कर रहे हैं, तो वे अपनी इबादत छोड़ कर दौड़ते हुए हक़ की नुसरत के लिए पहुँचे।
तफ़सीरे रूहुल बयान में है कि हज़रत हबीब नज्जार सिकंदर के ख़ानदान से थे। वे मदीना तय्यिबा के पुराने इलाक़े से गुज़रे थे और उन्होंने पेशीनगोई की थी कि यहाँ आख़िरी ज़माने के नबी ﷺ तशरीफ़ लाएंगे; उन्होंने बारह हज़ार उलमा व उमरा को वहाँ आबाद किया था। हज़रत अबू अय्यूब अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु हज़रत हबीब नज्जार की औलाद में से थे, और मदीना शरीफ़ में हज़रत अबू अय्यूब अंसारी का मकान उसी मुक़द्दस जगह पर था जहाँ हबीब नज्जार का खेमा लगा था!
इस आयत से साबित हुआ कि हक़ की नुसरत और रसूलों की हिमायत के लिए जान की बाज़ी लगा कर दौड़ना कामिल मोमिनों का शेवा है।
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