कुरान - 36:23 सूरह या-सीन अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

23
ءَأَتَّخِذُ مِن دُونِهِۦٓ ءَالِهَةً إِن يُرِدۡنِ ٱلرَّحۡمَٰنُ بِضُرّٖ لَّا تُغۡنِ عَنِّي شَفَٰعَتُهُمۡ شَيۡـٔٗا وَلَا يُنقِذُونِ

Transliteration: ('A-attakhizu min dooniheee aalihatan iny-yuridnir Rahmaanu bidurril-laa tughni 'annee shafaa 'atuhum shai 'anw-wa laa yunqizoon)

"क्या मैं उसे छोड़कर दूसरे माबूद बना लूँ [33]? अगर रहमान मुझे कोई तकलीफ़ पहुंचाना चाहे तो न उनकी शफ़ाअत मेरे कुछ काम आ सकती है [34] और न वे मुझे छुड़ा सकते हैं [35]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह या-सीन आयत 23 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह या-सीन तफ़सीर - आयत 23

"क्या मैं उसे छोड़कर दूसरे माबूद बना लूँ [33]? अगर रहमान मुझे कोई तकलीफ़ पहुंचाना चाहे तो न उनकी शफ़ाअत मेरे कुछ काम आ सकती है [34] और न वे मुझे छुड़ा सकते हैं [35];"

[33] शिर्क और बुतपरस्ती का मुकम्मल बुतलान

हज़रत हबीब नज्जार ने सवालिया अंदाज़ में बुतों की पूजा की बे-बुनियादी को ज़ाहिर किया कि जो मख़्लूक़ ख़ुद आजिज़ है, उसे ख़ुदा का शरीक बनाना कितनी बड़ी हिमाक़त है। अहले अंताकिया बुतपरस्त थे और वे पत्थरों से अपनी मुश्किलें हल होने की उम्मीद रखते थे।

[34] शफ़ाअते बातिला और शफ़ाअते हक़्क़ा का फ़र्क़

काफ़िरों के बातिल माबूद अल्लाह के अज़ाब के आगे ज़रा भी सिफ़ारिश नहीं कर सकते। अहले सुन्नत का मुत्तफ़िक़ा अक़ीदा है कि शफ़ाअत ब-इज़ने इलाही हक़ है — जो अल्लाह के अता से हुज़ूर ﷺ, अंबिया और औलिया-ए-किराम फ़रमाएंगे। बुतों के लिए शफ़ाअत का इंकार है क्योंकि वे बे-जान और बातिल हैं।

[35] नजात दिलाने से बे-बस बुत

बुत न किसी को मुसीबत से छुड़ा सकते हैं और न अपनी मदद आप कर सकते हैं। वे हर ऐतबार से लाचार हैं।

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