Transliteration: (Wash-shamsu tajree limustaqarril lahaa; zaalika taqdeerul 'Azeezil Aleem)
"और सूरज [55] अपने मुक़र्रर रास्ते पर चला जा रहा है [56]; यह ज़बरदस्त, सब कुछ जानने वाले का तय किया हुआ अंदाज़ा है [57]!"
यह आयत वाज़ेह फ़रमाती है कि सूरज साकिन नहीं है बल्कि अल्लाह के मुक़र्रर किए हुए दायरे में मुसलसल गर्दिश कर रहा है।
सूरज की यह गर्दिश उसके 'मुस्तक़र' यानी क़यामत के दिन तक जारी रहेगी, जब यह निज़ाम लपेट दिया जाएगा। हदीस शरीफ़ में है कि सूरज हर रोज़ अर्श के नीचे सज्दा करता है और तुलूअ होने की इजाज़त तलब करता है।
यह सारा अज़ीम फ़लकी निज़ाम उस अल्लाह की हिकमत और इल्म से क़ायम है जो सब पर ग़ालिब है।
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