Transliteration: (Lash shamsu yambaghee lahaaa an tudrikal qamara walal lailu saabiqun nahaar; wa kullun fee falaki yasbahoon)
"न सूरज के बस में है कि वह चाँद को पकड़े [60], और न रात दिन से आगे बढ़ सकती है [61]; और सब के सब एक-एक फ़लक में तैर रहे हैं [62]!"
सूरज दिन में और चाँद रात में अपनी ख़िदमत अंजाम देता है। चाँद अपना चक्कर एक माह में और सूरज एक साल में पूरा करता है। दोनों की रफ़्तार और काम में रब्बे क़ादिर ने मुकम्मल तवाज़ुन रखा है।
रात अपने मुक़र्रर वक़्त से पहले दिन पर ग़ालिब नहीं आ सकती। हाँ, क़यामत के क़रीब यह निज़ाम दरहम-बरहम होगा और सूरज व चाँद एक कर दिए जाएंगे (सूरह क़ियामह)।
सूरज, चाँद और सितारे अपने-अपने मदार में ऐसे तैर रहे हैं जैसे पानी में मछलियां तैरती हैं। यह कायनात का बे-मिसाल हुस्न अल्लाह की शान का आईनादार है।
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