कुरान - 36:43 सूरह या-सीन अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

43
وَإِن نَّشَأۡ نُغۡرِقۡهُمۡ فَلَا صَرِيخَ لَهُمۡ وَلَا هُمۡ يُنقَذُونَ

Transliteration: (Wa in nashaa nughriqhum falaa sareekha lahum wa laa hum yunqazoon)

और अगर हम चाहें तो उन्हें ग़र्क़ (डूबो) दें, फिर न कोई उनकी फ़रियाद सुनने वाला हो और न वे बचाए जाएं [65]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह या-सीन आयत 43 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह या-सीन तफ़सीर - आयत 43

"और अगर हम चाहें तो उन्हें ग़र्क़ कर दें, फिर न कोई उनकी फ़रियाद सुनने वाला हो और न वे बचाए जाएं [65];"

[65] सलामती और हलाकत पर अल्लाह का कामिल इख़्तियार

यह आयत वाज़ेह करती है कि कश्तियों और जहाज़ों का पानी पर तैरना सिर्फ़ लकड़ी या लोहे की ख़ासियत नहीं, बल्कि अल्लाह तआला के क़ानूने कु़दरत और हिफ़ाज़त के ताबे है।

अगर अल्लाह तआला चाहे तो उन मुसाफ़िरों को समुंदर की गहराइयों में ग़र्क़ फ़रमा दे, और उस वक़्त न कोई उनकी चीख़-पुकार सुनने वाला होगा और न कोई उन्हें बचा सकेगा। इंसान को किसी भी हाल में अपनी तदबीर पर घमंड नहीं करना चाहिए।

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