Transliteration: (Wa izaa qeela lahum anfiqoo mimmaa razaqakumul laahu qaalal lazeena kafaroo lillazeena aamanooo anut'imu mal-law yashaaa'ul laahu at'amahooo in antum illaa fee dalaalim mubeen)
"और जब उनसे कहा जाता है, 'उसमें से ख़र्च करो जो अल्लाह ने तुम्हें दिया है', तो काफ़िर मोमिनों से कहते हैं: 'क्या हम उन्हें खिलाएं [71] जिन्हें अगर अल्लाह चाहता तो ख़ुद खिला देता? तुम तो बस खुली गुमराही में हो [72]!'"
जब मोमिनों ने मुशरिकीन को अल्लाह की राह में ग़रीबों पर ख़र्च करने की तरग़ीब दी, तो काफ़िरों ने संजीदा जवाब देने के बजाय तकब्बुर और मज़ाक़ का रास्ता अपनाया।
काफ़िरों की यह दलील कि "अगर अल्लाह चाहता तो उन्हें ख़ुद खिला देता" दरअस्ल अस्बाब और वसीले का इंकार था। अल्लाह तआला बेशक क़ादिर-ए-मुतलक़ है, लेकिन उसने दुनिया को दारुल अस्बाब बनाया है और अमीरों के माल में ग़रीबों का हक़ रखकर उनकी आज़माइश की है।
काफ़िरों की यह बात महज़ उनके बुख़्ल (कंजूसी) और बदनियती का बहाना थी। वे तक़दीर की झूठी आड़ लेकर फ़ुक़रा के हक़ से बचते थे और उलटा नेक मोमिनों को ही "गुमराह" क़रार देते थे।
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