कुरान - 36:67 सूरह या-सीन अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

67
وَلَوۡ نَشَآءُ لَمَسَخۡنَٰهُمۡ عَلَىٰ مَكَانَتِهِمۡ فَمَا ٱسۡتَطَٰعُواْ مُضِيّٗا وَلَا يَرۡجِعُونَ

Transliteration: (Wa law nashaaa'u lamasakhnaahum 'alaa makaanatihim famas-tataa'oo mudiyyanw-wa laa yarji'oon)

और अगर हम चाहते तो उनकी सूरतों (और जगहों) पर उन्हें मस्क़ कर देते (बे-जान या पत्थर बना देते) [99], फिर न वे आगे बढ़ सकते और न पीछे लौट सकते! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह या-सीन आयत 67 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह या-सीन तफ़सीर - आयत 67

"और अगर हम चाहते तो उनकी जगहों पर उन्हें मस्क़ कर देते [99], फिर न वे आगे बढ़ सकते और न पीछे लौट सकते!"

[99] सूरतें मस्क़ कर देना और लाचारगी

अल्लाह तआला क़ादिर है कि काफ़िरों को उनके घरों और महफ़िलों में ही पत्थर या चौपाया जानवर बना दे, या उन्हें ऐसा फ़ालिजज़दा और अपाहिज कर दे कि वे न अपनी जगह से एक क़दम आगे बढ़ सकें और न पीछे हट सकें। अल्लाह की इस क़ुदरत के सामने इंसान निहायत कमज़ोर और आजिज़ है।

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